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ग्राम्य जीवन की कहानियाँ (कहानी-संग्रह)

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :268
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8459

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उपन्यासों की भाँति कहानियाँ भी कुछ घटना-प्रधान होती हैं, मगर…


सबेरे जब उसकी नींद खुली, तब चारों तरफ धूप फैल गयी थी और मुन्नी कह रही थी–क्या आज सोते ही रहोगें? तुम यहाँ आ कर रम गये और उधर सारा खेत चौपट हो गया।

हल्कू न उठ कर कहा–क्या तू खेत से हो कर आ रही है?

मुन्नी बोली–हाँ, सारे खेत का सत्यनाश हो गया। भला, ऐसा भी कोई सोता है। तुम्हारे यहाँ मँड़ैया डालने से क्या हुआ?

हल्कू ने बहाना किया–मैं मरते-मरते बचा, तुझे अपने खेत की पड़ी हैं। पेट में ऐसा दरद हुआ; ऐसा दरद हुआ कि मैं ही जानता हूँ ।

दोनों फिर खेत के डाँड पर आयें। देखा, सारा खेत रौदा पड़ा हुआ है और जबरा मँड़ैया के नीचे चित लेटा है, मानो प्राण ही न हों।

दोनों खेत की दशा देख रहे थें। मुन्नी के मुख पर उदासी छायी थी, पर हल्कू प्रसन्न था।

मुन्नी ने चिन्तित हो कर कहा–अब मजूरी कर के माल गुजारी भरनी पड़ेगी।

हल्कू ने प्रसन्न मुख से कहा–रात की ठंड में यहाँ सोना तो न पड़ेगा।

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