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गुप्त धन-1 (कहानी-संग्रह)

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :447
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8461

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प्रेमचन्द की पच्चीस कहानियाँ


तीसरे पहर का वक़्त था। क्वार की धूप तेज़ थी। कुंवर इन्दरमल अपने हवा की चालवाले घोड़े पर सवार इन्दौर की तरफ़ से आए और एक पेड़ की छाया में ठहर गए। वह बहुत उदास थे। उन्होंने घोड़े को पेड़ से बाँध दिया और खु़द ज़ीन के ऊपर डालने वाला कपड़ा बिछाकर लेट रहे। उन्हें अचलगढ़ से निकले आज तीसरा दिन है मगर चिन्ताओं ने पलक तक नहीं झपकने दी। रानी भानकुंवर उसके दिल से एक पल के लिए भी दूर न होती थी। इस वक़्त ठण्डी हवा लगी तो नींद आ गई। सपने में देखने लगा कि जैसे रानी आई हैं और उसे गले लगाकर रो रही हैं। चौंककर आँखें खोलीं तो रानी सचमुच सामने खड़ी उसकी तरफ़ आँसू भरी आँखों से ताक रही थीं। वह उठ बैठा और माँ के पैरों को चूमा। मगर रानी ने ममता से उठाकर गले लगा लेने के बजाय अपने पाँव हटा लिए और मुँह से कुछ न बोली।

इन्दरमल ने कहा—माँ जी, आप मुझसे नाराज़ हैं?

रानी ने रुखाई से जवाब दिया—मैं तुम्हारी कौन होती हूँ!

कुंवर—आपको यकीन आए न आए, मैं जब से अचलगढ़ से चला हूँ एक पल के लिए भी आपका ख़्याल दिल से दूर नहीं हुआ। अभी आप ही को सपने में देख रहा था।

इन शब्दों ने रानी का गुस्सा ठंडा किया। कुँवर की ओर से निश्चिंत होकर अब वह राजा का ध्यान कर रही थी। उसने कुंवर से पूछा—तुम तीन दिन कहाँ रहे? कुंवर ने जवाब दिया—क्या बताऊँ, कहाँ रहा। इन्दौर चला गया था वहाँ पोलिटिकल एजेण्ट से सारी कथा कह सुनाई।

रानी ने यह सुना तो माथा पीटकर बोली—तुमने ग़जब कर दिया। आग लगा दी।

इन्दरमल—क्या करुँ, खुद पछताता हूँ, उस वक़्त यही धुन सवार थी।

रानी—मुझे जिन बातों का डर था वह सब हो गईं। अब कौन मुँह लेकर अचलगढ़ जायँगे।

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