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गुप्त धन-2 (कहानी-संग्रह)

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :467
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8464

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प्रेमचन्द की पच्चीस कहानियाँ


बुढ़िया– लालच किसे कहते हैं बेटा, मैं भूल गयी।

लड़का– इसी से तुझे पगली नानी कहते है। तुझे न लोभ है, घिन है, न विचार है, न लाज है। ऐसों ही को पागल कहते हैं।

बुढ़िया– तो यही कहो, मैं पगली हूँ।

लड़का– तुझे क्रोध क्यों नहीं आता?

बुढ़िया– क्या जाने बेटा। मुझे तो क्रोध नहीं आता। क्या किसी को क्रोध भी आता है? मैं तो भूल गयी।

कई लड़कों ने इस पर ‘पगली, पगली’ का शोर मचाया और बुढ़िया उसी तरह शांत भाव से आगे चली। जब वह निकट आई तो मन्नू उसे पहचान गया। यह तो मेरी बुधिया है। वह दौड़कर उसके पैरों से लिपट गया। बुढ़िया ने चौंककर मन्नू को देखा, पहचान गई। उसने उसे छाती से लगा लिया।

मन्नू को गोद में लेते ही बुधिया का अनुभव हुआ कि मैं नग्न हूँ। मारे शर्म के वह खड़ी न रह सकी। बैठकर एक लड़के से बोली– बेटा, मुझे कुछ पहनने को दोगे?

लड़का– तुझे तो लाज ही नहीं आती न?

बुढ़िया– नहीं बेटा, अब तो आ रही है। मुझे न जाने क्या हो गया था।

लड़कों ने फिर ‘पगली, पगली’ का शोर मचाया। तो उसने पत्थर फेंककर लड़कों को मारना शुरू किया। उनके पीछे दौड़ी।

एक लड़के ने पूछा– अभी तो तुझे क्रोध नहीं आता था। अब क्यों आ रहा है?

बुढ़िया– क्या जाने क्यों, अब क्रोध आ रहा है। फिर किसी ने पगली कहा तो बन्दर से कटवा दूँगी।

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