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गुप्त धन-2 (कहानी-संग्रह)

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :467
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8464

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प्रेमचन्द की पच्चीस कहानियाँ


मियाँ वाजिद बौखलाये हुए आगे बढ़े और हाथ बांधकर बोले– खुदावंद, कुँअर साहब ने आज बहुत देर से खाना खाया, तो तबियत कुछ भारी हो गयी है। इस वक़्त आराम में हैं, बाहर नहीं आ सकते।

काटन– ओह! तुम यह क्या बोलता है? वह तो हमारे साथ नैनीताल जाने वाला था। उसने हमको खत लिखा था।

वाजिद– हाँ, हुजूर, जाने वाले तो थे, पर बीमार हो गये।

काटन– बहुत रंज हुआ।

वाजिद– हुजूर, इत्तफाक़ है।

काटन– हमको बहुत अफ़सोस है। कुँअर साहब से जाकर बोलो, हम उनको देखना माँगता है।

वाजिद– हुजूर, बाहर नहीं आ सकते।

काटन– कुछ परवाह नहीं, हम अन्दर जाकर देखेगा।

कुँअर साहब दरवाज़े से चिमटे हुए काटन साहब की बातें सुन रहे थे। नीचे की साँस नीचे थी, ऊपर की ऊपर। काटन साहब को घोड़े से उतरकर दरवाज़े की तरफ़ आते देखा, तो गिरते-पड़ते दौड़े और सुशीला से बोले– दुष्ट मुझे देखने घर में आ रहा है। मैं चारपाई पर लेट जाता हूँ, चटपट लिहाफ़ निकलवाओं और मुझे ओढ़ा दो। दस-पाँच शीशियां लाकर इस गोलमेज पर रखवा दो।

इतने में वाजिदअली ने द्वार खटखटाकर कहा– महरी, दरवाज़ा खोल दो, साहब बहादुर कुँअर साहब को देखना चाहते है। सुशीला ने लिहाफ माँगा, पर गर्मी के दिन थे, जाड़े के कपड़े सन्दूकों में बन्द पड़ें थे। चटपट सन्दूक खोलकर दो-तीन मोटे-मोटे लिहाफ लाकर कुँअर साहब को ओढा दिये। फिर आलमारी से कई शीशियां और कई बोतल निकालकर मेज पर चुन दिये और महरी से कहा– जाकर किवाड़ खोल दो, मैं ऊपर चली जाती हूँ।

काटन साहब ज्यों ही कमरे में पहुँचे, कुँअर साहब ने लिहाफ से मुँह निकाल लिया और कराहते हुए बोले– बड़ा कष्ट है हुजूर। सारा शरीर फुँका जाता है।

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