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गुप्त धन-2 (कहानी-संग्रह)

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :467
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8464

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प्रेमचन्द की पच्चीस कहानियाँ


रामू ने सजल नेत्रों से उसे देखा, पर कुछ कह न सका। दोनों हाथ जोड़कर उसे प्रणाम किया, पर हाथ जुड़े ही रह गये, और आँख उलट गयी।

लाश घर में पड़ी थी। रजिया रोती थी, दसिया चिन्तित थी। घर में रुपये का नाम नहीं। लकड़ी तो चाहिए ही, उठाने वाले भी जलपान करेंगे ही, कफ़न के बगैर लाश उठेगी कैसे। दस से कम का खर्च न था। यहाँ घर में दस पैसे भी नहीं। डर रही थी कि आज गहनों पर आफत आयी। ऐसी कीमती भारी गहने ही कौन थे। किसान की बिसात ही क्या, दो-तीन नग बेचने से दस मिल जायँगे। मगर और हो ही क्या सकता है। उसने चौधरी के लड़के को बुलाकर कहा– देवर जी, यह बेड़ा कैसे पार लागे! गाँव में कोई धेले का भी विश्वास करने वाला नहीं। मेरे गहने हैं। चौधरी से कहो, इन्हें गिरों रखकर आज का काम चलायँ, फिर भगवान् मालिक है।

‘रजिया से क्यों नहीं माँग लेती।’

सहसा रजिया आँखें पोंछती हुई आ निकली। कान में भनक पड़ी। पूछा– क्या है जोखूँ, क्या सलाह कर रहे हो? अब मिट्टी उठाओगे कि सलाह की बेला है?

‘हाँ, उसी का सराजाम कर रहा हूँ।’

‘रुपये-पैसे तो यहाँ होंगे नहीं। बीमारी में खरच हो गये होंगे। इस बेचारी को तो बीच मँझधार में लाकर छोड़ दिया। तुम लपक कर उस घर चले जाओ भैया! कौन दूर है, कुँजी लेते जाओ। मँजूर से कहना, भंडार से पचास रुपये निकाल दे। कहना, ऊपर की पटरी पर रखे हैं।’

वह तो कुँजी लेकर उधर गया, इधर दसिया राजो के पैर पकड़ कर रोने लगी। बहनापे के ये शब्द उसके हृदय में बैठ गये। उसने देखा, रजिया में कितनी दया, कितनी क्षमा है।

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