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गुप्त धन-2 (कहानी-संग्रह)

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :467
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8464

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प्रेमचन्द की पच्चीस कहानियाँ


हम सब सिर झुकाये सुनते रहे और झल्लाते रहे। हेलेन कमरे से निकलकर कार पर जा बैठी। उसने अपने रवानगी का इन्तजाम पहले ही कर लिया था। इसके पहले कि हमारे होश-हवास सही हों और हम परिस्थिति समझें, वह जा चुकी थी।

हम सब हफ़्ते-भर तक बम्बई की गलियों, होटलों, बंगलों की ख़ाक छानते रहे, हेलेन कहीं न थी और ज़्यादा अफ़सोस यह है कि उसने हमारी जिंदगी का जो आइडियल रखा वह हमारी पहुँच से ऊँचा है। हेलेन के साथ हमारी ज़िन्दगी का सारा जोश और उमंग ख़त्म हो गयी।

–  ‘ज़माना’, जुलाई, १९३४
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