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गुप्त धन-2 (कहानी-संग्रह)

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :467
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8464

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प्रेमचन्द की पच्चीस कहानियाँ


श्यामा– न गिरूंगी भइया, तुम नीचे से पकड़े रहना।

केशव– न भइया, कहीं तू गिर-गिरा पड़ी तो अम्माँ जी मेरी चटनी ही कर डालेंगी। कहेंगी कि तूने ही चढ़ाया था। क्या करेगी देखकर। अब अण्डे बड़े आराम से हैं। जब बच्चे निकलेगें, तो उनको पालेंगे।

दोनों चिड़ियाँ बार-बार कार्निस पर आती थीं और बगैर बैठे ही उड़ जाती थीं। केशव ने सोचा, हम लोगों के डर के मारे नहीं बैठतीं। स्टूल उठाकर कमरे में रख आया, चौकी जहाँ की थी, वहाँ रख दी।

श्यामा ने आँखों में आँसू भरकर कहा– तुमने मुझे नहीं दिखाया, मैं अम्माँ जी से कह दूँगी।

केशव– अम्माँ जी से कहेगी तो बहुत मारूँगा, कहे देता हूँ।

श्यामा– तो तुमने मुझे दिखाया क्यों नहीं?

केशव– और गिर पड़ती तो चार सर न हो जाते!

श्यामा– हो जाते, हो जाते। देख लेना मैं कह दूँगी।

इतने में कोठरी का दरवाज़ा खुला और माँ ने धूप से आँखें को बचाते हुए कहा– तुम दोनों बाहर कब निकल आये? मैंने कहा था न कि दोपहर को न निकलना? किसने किवाड़ खोला?

किवाड़ केशव ने खोला था, लेकिन श्यामा ने मां से यह बात नहीं कही। उसे डर लगा कि भैया पिट जायेंगे। केशव दिल में कांप रहा था कि कहीं श्यामा कह न दे। अण्डे न दिखाये थे, इससे अब उसको श्यामा पर विश्वास न था श्यामा सिर्फ़ मुहब्बत के मारे चुप थी या इस क़सूर में हिस्सेदार होने की वजह से, इसका फैसला नहीं किया जा सकता। शायद दोनों ही बातें थीं।

माँ ने दोनों को डाँट-डपटकर फिर कमरे में बंद कर दिया और आप धीरे-धीरे उन्हें पंखा झलने लगी। अभी सिर्फ़ दो बजे थे बाहर तेज लू चल रही थी। अब दोनों बच्चों को नींद आ गयी थी।

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