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हिन्दी की आदर्श कहानियाँ

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :204
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8474

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प्रेमचन्द द्वारा संकलित 12 कथाकारों की कहानियाँ


वह कूदता हुआ आया। नयी माता ने उसे हृदय से लगा लिया। बालक कुछ न समझ सका, वह मौसी की ओर भागा।

बिब्बो ने उसे दुतकारा–जा, दूर हो।

बेचारा बालक दुत्कार का अर्थ समझने में असमर्थ था। वह रो पड़ा।

बसंत हतबुद्धि खड़ा था। बिब्बो ने मन्नू का हाथ पकड़ा, मुँह धोया और आँगन के ताख से जूते उतारकर पहना दिये।

बसंत की स्त्री मुस्कराकर बोली–मौसी, क्या एक दिन भी न रहने दोगी? अभी क्या जल्दी है। पर, बिब्बो जैसे किसी दूसरे लोक पहुँच गयी हो। जहाँ वह स्वर–संसार का कोई स्वर–न पहुँच सकता हो। पलक मारते मन्नू की खेल की, प्यार की, दुलार की सभी वस्तुएँ बाँध दीं। मन्नू को भी समझा दिया कि वह सैर करने अपनी नयी माँ के साथ जा रहा था।
मन्नू उछलता हुआ पिता के पास खड़ा हो गया था। बिब्बो ने कुछ नोट और रुपये उसके सम्मुख लाकर डाल दिये–ले अपने रुपये।

बसंत धर्म-संकट में पड़ा था, पर उसकी अर्द्धांगिनी ने उसका निवारण कर दिया। उसने रुपये उठा लिये, ‘मौसी, इस समय हम असमर्थ हैं, पर जाते ही अधिक भेजने का प्रयत्न करूँगी, तुमसे हम लोग कभी उऋण नहीं हो सकते।’

मन्नू माता-पिता के घर बहुत दिनों तक सुखी न रह सका। महीने में दो बार रोग-ग्रस्त हुआ। नयी माँ भी मन्नू को पाकर कुछ अधिक सुखी न हो सकी। अंत में एक दिन रात-भर जागकर बसंत स्त्री के रोने-धोने पर भी मन्नू को लेकर मौसी के घर चल दिया।

वहाँ पहुँचकर उसने देखा कि मौसी के जीर्ण द्वार पर कुछ लोग जमा हैं। बसंत के एक्के को घेरकर उन्होंने कहा–आपकी यह मौसी है। आज पाँच दिन से द्वार बन्द है, हम लोग आशंकित हैं।

द्वार तोड़कर लोगों ने देखा–वृद्धा पृथ्वी पर एक चित्र का आलिंगन किये नीचे पड़ी है, जैसे वह मरकर अपने मानव होने का प्रमाण दे रही हो।

बसंत के अतिरिक्त किसी ने न जाना वह चित्र उसी के पिता का था, पर वह भी यह न जान सका कि वह वहाँ क्यों था।

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