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प्रेम पीयूष ( कहानी-संग्रह )

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :225
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8584

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नव जीवन पत्रिका में छपने के लिए लिखी गई कहानियाँ


विप्र–मैं यह न मानूँगा। सात साल हो गए, अब एक दिन का भी मुलाहिजा न करूँगा! गेहूँ नहीं दे सकते, तो दास्तावेज लिख दो।

शंकर–मुझे तो देना है, चाहे गेहूँ लो, चाहे दास्तावेज। किस हिसाब से दाम रखोगे?

विप्र–बाजार भाव पाँच सेर का है, तुम्हें सवा पाँच सेर का काट दूँगा।

शंकर–जब दे ही रहा हूँ तो बाजार–भाव काटूँगा, पाव-भर छुड़ाकर क्यों दोषी बनूँ ?

हिसाब लगाया गया तो गेहूँ के दाम ६॰ रुपये हुए। ६॰ रु. का दास्तावेज लिखा गया, ३ रु. सैकड़े सूद। साल भर में देने पर सूद की दर ३।। रु. सैकड़े, १२ आने का स्टाम्प, १ रु. दास्तावेज की तहरीर शंकर को ऊपर से देनी पड़ी।

गाँव-भर ने विप्रजी की निंदा की, लेकिन मुँह पर नहीं। महाजन से सभी का काम पड़ता है, उसके मुँह कौन आए?

शंकर ने साल-भर तक कठिन तपस्या की। मियाद के पहले रुपये अदा करने का व्रत सा कर लिया। दोपहर को पहले भी चूल्हा न जलता था, चबेने पर बसर होती थी, अब वह भी बंद हुआ, केवल लड़के के लिए रात को रोटियाँ रख दी जातीं। पैसे रोज का तम्बाकू पी जाता था। यही एक व्यसन था, जिसे वह कभी न त्याग सका था। अब वह व्यसन भी इस कठिन व्रत की भेंट हो गया। उसने चिलम पटक दी, हुक्का तोड़ दिया और तमाखू की हांड़ी चूर-चूर कर डाली। कपड़े पहले भी त्याग की चरम सीमा तक पहुँच चुके थे, अब वह प्रकृति की न्यूनतम रेखाओं में आबद्ध की चरम सीमा तक पहुँच चुके थे, अब वह प्रकृति की न्यूनतम रेखाओं में आबद्ध हो गए। शिशिर के अस्थि-बेधक शीत को उसने आग तापकर काट दिया। इस ध्रुव संकल्प का फल आ़शा से बढ़कर निकला। साल के अंत में उसके पास ६॰ रु. जमा हो गए। उसने समझा, पंडितजी को इतने रुपये दूँगा और कहूँगा–महाराज, बाकी रुपये भी जल्द ही आपके सामने हाजिर करूँगा। १५ रु. की तो और बात है क्या पंडित जी इतना भी न मानेंगे? उसने रुपये लिए और ले जाकर पंडित जी के चरण-कमलों पर अर्पण कर दिए। पंडितजी ने विस्मित होकर पूछा–किसी से उधार लिये क्या?

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