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प्रेम प्रसून ( कहानी-संग्रह )

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :286
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8588

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इन कहानियों में आदर्श को यथार्थ से मिलाने की चेष्टा की गई है


एक दिन पंडित अमरनाथ की लालाजी से भेंट हो गई। उन्होंने पूछा–कहिए, पाठशाला खूब चल रही है न?

गोपीनाथ–कुछ न पूछिए। दिनोंदिन दशा गिरती जाती है।

अमरनाथ–आनंदीबाई की ओर से ढील है क्या?

गोपीनाथ–जी हाँ सरासर। अब काम करने में उनका जी नहीं लगता। बैठी हुई योग और ज्ञान के ग्रन्थ पढ़ा करती हैं। कुछ कहता हूँ, तो कहती हैं–‘मैं अब और अधिक कुछ नहीं कर सकती। कुछ परलोक की भी चिंता करूँ कि चौबीसों घंटे पेट के धंधों में ही लगी रहूँ? पेट के लिए पाँच घंटे बहुत हैं। यहाँ आकर मैंने अपना स्वास्थ्य खो दिया। एक बार कठिन रोग में ग्रस्त हो गई, क्या कमेटी ने मेरी दवा-दारू का खर्च दे दिया? कोई बात पूछने भी आया? फिर अपनी जान क्यों दूँ?’ सुना है, घरों में मेरी बदगोई भी किया करती है। अमरनाथ मार्मिक भाव से बोले–ये बातें मुझे पहले ही मालूम थीं।

दो साल और गुजर गए। रात का समय था। कन्या-पाठशाला के ऊपरवाले कमरे में गोपीनाथ मेज के सामने कुरसी पर बैठे हुए थे। सामने आनंदी कोच पर लेटी हुई थी। उसका मुख बहुत म्लान हो रहा था। कई मिनट तक दोनों विचार में मग्न थे। अंत में गोपीनाथ बोले–मैंने पहले ही महीने में तुमसे कहा था कि मथुरा चली जाओ।

आनंदी–वहाँ दस महीने क्योंकर रहती! मेरे पास इतने रुपये कहाँ थे, और न तुम्हीं ने कोई प्रबंध करने का आश्वासन दिया। मैंने सोचा, तीन चार महीने यहाँ रहूँ, तब तक किफायत करके कुछ बचा लूँगी, और तुम्हारी किताब से भी कुछ रुपये मिल जायँगे। तब मथुरा चली जाऊँगी। मगर यह क्या मालूम था कि बीमारी भी इसी अवसर की ताक में बैठी हुई है। मेरी दशा दो-चार दिन के लिए भी सँभली, और मैं चली। इस दशा में तो मेरे लिए यात्रा करना असम्भव है।

गोपीनाथ–मुझे भय है कि कहीं बीमारी तूल न खींचे। संग्रहणी असाध्य रोग है।महीने-दो महीने यहाँ और रहना पड़ गया, तो बात खुल जायगी।

आनंदी–(चिढ़कर) खुल जायगी, खुल जाए। अब इससे कहाँ तक डरूँ!

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