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प्रेम प्रसून ( कहानी-संग्रह )

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :286
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8588

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इन कहानियों में आदर्श को यथार्थ से मिलाने की चेष्टा की गई है


नौ बज गए थे। सेठ चंदूमल गंगा-स्नान करके लौट आए थे, और मसनद पर बैठकर चिट्ठियाँ पढ़ रहे थे। अन्य दूकान के मुनीमों ने अपनी विपत्ति-कथा सुनाई थी! एक-एक पत्र पढ़कर सेठजी का क्रोध बढ़ता जाता था। इतने में दो वालंटियर झंडियाँ लिये उनकी दूकान के सामने आकर खड़े हो गए।

सेठजी ने डाँटकर कहा–हट जाओ हमारी दूकान के सामने से।

एक वालंटियर ने उत्तर दिया–महाराज, हम तो सड़क पर हैं। क्या यहाँ से भी चले जायँ?

चंदूमल–तुम्हारी सूरत नहीं देखना चाहता।

वालंटियर–तो आप कांग्रेस-कमेटी को लिखिए। हमको तो वहाँ से यहीं खड़े रहकर पहरा देने का हुक्म मिला है।

एक कांस्टेबिल ने आकर कहा–क्या है सेठजी, यह लौंडा क्या टर्राता है?

चंदूमल बोले–मैं कहता हूँ, दूकान के सामने से हट जाओ, पर यह कहता है, न हटेंगे, न हटेंगे। जरा इसकी जबरदस्ती देखो।

कांस्टेबिल–(वालंटियरों से) तुम दोनों यहाँ से जाते हो कि गर्दन नापूँ।

वालंटियर–हम सड़क पर खड़े हैं, दूकान पर नहीं।

कांस्टेबिल का अभीष्ट अपनी कारगुजारी दिखाना था! वह सेठजी को खुश करके कुछ इनाम-एकराम भी लेना चाहता था। उसने वालंटियरों को अपशब्द कहे, और जब उन्होंने उसकी कुछ परवाह न की, तो एक वालंटियर को इतनी जोर से धक्का दिया कि वह बेचारा मुँह के बल जमीन पर गिर पड़ा। कई वालंटियर इधर-उधर से आकर जमा हो गए। कई सिपाही भी आ पहुँचे। दर्शकवृन्द को ऐसी घटनाओं में मजा आता ही है। उनकी भीड़ लग गई। किसी ने हाँक लगायी–‘महात्मा गाँधी की जय।’ औरों ने भी उसके सुर-में-सुर मिलाया, देखते-देखते एक जन-समूह एकत्र हो गया।

एक दर्शक ने कहा–क्या है लाला चंदूमल! अपनी दूकान के सामने इन गरीबों की यह दुर्गति करा रहे हो, तुम्हें जरा भी लज्जा नहीं आती? कुछ भगवान का भी डर है या नहीं?

सेठजी ने कहा–मुझसे कसम ले लो, जो मैंने किसी सिपाही से कुछ कहा हो। ये लोग अनायास बेचारों के पीछे पड़ गए। मुझे नाहक बदनाम करते हो।

एक सिपाही–लालाजी, आप ही ने तो कहा था कि ये दोनों वालंटियर मेरे ग्राहकों को छेड़ रहे हैं। अब आप निकलें जाते हैं।

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