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सप्त सरोज (कहानी संग्रह)

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :140
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8624

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मुंशी प्रेमचन्द की सात प्रसिद्ध कहानियाँ


फिर सन्नाटा हो गया। मालूम होता था कि आदमियों में काना-फूसी हो रही है। बीच-बीच में मुख्तार साहब और सिपाहियों के हृदय-विदारक शब्द आकाश में गूँज उठते। फिर ऐसा जान पड़ा कि किसी पर मार पड़ रही है। शर्माजी से अब न रहा गया। वह सीढ़ियों के द्वार पर आये। कमरे में झाँककर देखा। मेज पर रुपये गिने जा रहे थे। दारोगा जी ने फरमाया– इतने बड़े गाँव में सिर्फ़ यही?

मुख्तार साहब ने उत्तर दिया– अभी घबराइए नहीं। अबकी मुखियों की खबर ली जाए। रुपयों का ढेर लग जाता है।

यह कहकर मुख्तार ने कई किसानों को पुकारा, पर कोई न बोला, तब दारोगाजी का गगनभेदी नाद सुनाई दिया– यह लोग सीधे से न मानेंगे, मुखियों को पकड़ लो। हथकड़ियाँ भर दो। एक-एक को डामल भिजवाऊँगा।

यह नादिरशाही हुक्म पाते ही कांस्टेबलों का दल उन आदमियों पर टूट पड़ा। ढोल-सी पिटने लगी। क्रन्दन ध्वनि से आकाश गूँज उठा। शर्माजी का रक्त खौल रहा था। उन्होंने सदैव न्याय और सत्य की सेवा की थी। अन्याय और निर्दयता का यह करुणात्मक अभियान उनके लिए असह्य था।

अचानक किसी ने रोकर कहा– दोहाई सरकार की, मुख्तार साहब हम लोगन का हक नाहक मरवाये डारत हैं!

शर्माजी क्रोध से काँपते हुए धम-धम कोठे से उतर पड़े। यह दृढ संकल्प कर लिया कि मुख्तार साहब को मारे हंटरों के गिरा दूँ, पर जन-सेवा में मनोवेगों को दबाने की बड़ी प्रबल शक्ति होती है। रास्ते ही में सँभल गए। मुख्तार को बुलाकर कहा– मुंशीजी, आपने यह क्या गुलगपाड़ा मचा रखा है?

मुख्तार ने उत्तर दिया– हुजूर, दारोगाजी ने इन्हें एक डाके की तहकीकात में तलब किया है।

शर्माजी बोले– जी हाँ, इस तहकीकात का अर्थ मैं खूब समझता हूँ। घण्टे भर से इसका तमाशा देख रहा हूँ। तहकीकात हो चुकी या कुछ कसर बाकी है?

मुख्तार ने कहा– हुजूर, दारोगाजी जानें, मुझे क्या मतलब?

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