लोगों की राय

कहानी संग्रह >> प्रेमचन्द की कहानियाँ 22

प्रेमचन्द की कहानियाँ 22

प्रेमचंद

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2017
पृष्ठ :180
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9783

Like this Hindi book 10 पाठकों को प्रिय

54 पाठक हैं

प्रेमचन्द की सदाबहार कहानियाँ का बाइसवाँ भाग


मलूका ने सामने आकर विनयपूर्वक कहा- ''सरकार, हम लोगों से जो कुछ भूल-चूक हुई उसे क्षमा किया जाए। हम लोग सब हजूर के चाकर हैं; सरकार ने हमको पाला-पोसा है। अब भी हमारे ऊपर यही निगाह रहे।''

कुँवर साहब का उत्साह बढ़ा। समझे कि पंडित के चले जाने से इन सबों के होश ठिकाने हुए हैं। अब किसका सहारा लेंगे। उसी खुर्राट ने इन सबों को बहका दिया था। कड़ककर बोले- ''वे तुम्हारे सहायक पंडित कहाँ गए? वो आ जाते तो जरा उनकी खबर ली जाती।''

यह सुनकर मलूका की आँखों में आँसू भर आए। वह बोला- ''सरकार उनको कुछ न कहें। वे आदमी नहीं, देवता थे। जवानी की सौगंध है, जो उन्होंने आपकी कोई निंदा की हो। वे बेचारे तो हम लोगों को बार-बार समझाते थे कि देखो, मालिक से बिगाड़ करना अच्छी बात नहीं। हमसे कभी एक लोटा पानी के रवादार नहीं हुए। चलते-चलते हम लोगों से कह गए कि मालिक का जो कुछ तुम्हारे जिम्मे निकले चुका देना। आप हमारे मालिक हैं। हमने आपका बहुत खाया-पिया है। अब हमारी यही विनती सरकार से है कि हमारा हिसाब-किताब देखकर जो कुछ हमारे ऊपर निकले बताया जाए। हम एक-एक कौड़ी चुका देंगे, तब पानी पिएँगे।''

कुँवर साहब सन्न हो गए। इन्हीं रुपयों के लिए कई बार खेत कटवाने पड़े थे। कितनी बार घरों में आग लगवाई। अनेक बार मारपीट की। कैसे-कैसे दंड दिए और आज ये सब आपसे आप सारा हिसाब-किताब साफ करने आए हैं! यह क्या जादू है! मुख्तार आम साहब ने कागजात खोले और असामियों ने अपनी-अपनी पोटलियाँ। जिसके जिम्मे जितना निकला, बे-कान पूछ हिलाए उसने द्रव्य सामने रख दिया। देखते-देखते सामने रुपयों का ढेर लग गया। 6०० रुपया बात-की-बात में वसूल हो गए। किसी के जिम्मे कुछ बाकी न रहा। यह सत्यता और न्याय की विजय थी। कठोरता और निर्दयता से जो काम कभी न हुआ, वह धर्म्म और न्याय ने पूरा कर दिखाया।

जब से ये लोग मुकद्दमा जीत कर आए तभी से उनको रुपया चुकाने की धुन सवार थी। पंडितजी को वे यथार्थ में देवता समझते थे। उनकी रुपया चुका देने के लिए विशेष आज्ञा थी। किसी ने अन्न बेचा, किसी ने बैल, किसी ने गहने बंधक रखे। यह सब कुछ सहन किया, परंतु पंडितजी की बात न टाली। कुँवर साहब के मन में पंडितजी के प्रति जो बुरे विचार थे वे सब मिट गए, लेकिन उन्होंने सदा से कठोरता से काम लेना सीखा था। उन्हीं नियमों पर वे चलते थे। न्याय तथा सत्यता पर उनका विश्वास न था, किंतु आज उन्हें प्रत्यक्ष देख पड़ा कि सत्यता और कोमलता में बहुत बड़ी शक्ति है।

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book