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कहानी संग्रह >> प्रेमचन्द की कहानियाँ 35 प्रेमचन्द की कहानियाँ 35प्रेमचंद
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प्रेमचन्द की सदाबहार कहानियाँ का पैंतीसवाँ भाग
किन्तु अभी रामचन्द्र की विपत्तियों का अन्त न हुआ था। उन पर एक बड़ी बिजली और गिरने वाली थी। एक दिन एक साधु उनसे मिलने आया और बोला- मैं आपसे अकेले में कुछ कहना चाहता हूं। जब तक मैं बातें करता रहूं, कोई दूसरा कमरे में न आने पाये।
रामचन्द्र महात्माओं का बड़ा सम्मान करते थे। इस विचार से कि किसी साधारण द्वारपाल को द्वार पर बैठा दूंगा तो सम्भव है कि वह किसी बड़े धनीमानी को अन्दर आने से रोक न सके, उन्होंने लक्ष्मण को द्वार पर बैठा दिया और चेतावनी दे दी कि सावधान रहना, कोई अंदर न आने पाये। यह कहकर रामचन्द्र उस साधु से कमरे में बातें करने लगे। संयोग से उसी समय दुर्वासा ऋषि आ पहुंचे और रामचन्द्र से मिलने की इच्छा प्रकट की।
लक्ष्मण ने कहा- अभी तो महाराज एक महात्मा से बातें कर रहे हैं। आप तनिक ठहर जायं तो मैं मिला दूंगा।
दुर्वासा अत्यन्त क्रोधी थे। क्रोध उनकी नाक पर रहता था। बोले- मुझे अवकाश नहीं है। मैं इसी समय रामचन्द्र से मिलूंगा। यदि तुम मुझे अंदर जाने से रोकोगे तो तुम्हें ऐसा शाप दे दूंगा कि तुम्हारे वंश का सत्यानाश हो जायगा।
बेचारे लक्ष्मण बड़ी दुविधा में पड़े। यदि दुर्वासा को अंदर जाने देते हैं तो रामचन्द्र अप्रसन्न होते हैं, नहीं जाने देते तो भयानक शाप मिलता है। आखिर उन्हें रामचन्द्र की अप्रसन्नता ही अधिक सरल प्रतीत हुई। दुर्वासा को अंदर जाने की अनुमति दे दी। दुर्वासा अंदर पहुंचे। उन्हें देखते ही वह साधु बहुत बिगड़ा और रामचन्द्र को सख्त सुस्त कहता चला गया। दुर्वासा भी आवश्यक बातें करके चले गये। किन्तु रामचन्द्र को लक्ष्मण का यह कार्य बहुत बुरा मालूम हुआ। बाहर आते ही लक्ष्मण से पूछा- जब मैंने तुमसे आग्रहपूर्वक कह दिया था तो तुमने दुर्वासा को क्यों अंदर जाने दिया? केवल इस भय से कि दुर्वासा तुम्हें शाप दे देते।
लक्ष्मण ने लज्जित होकर कहा- महाराज! मैं क्या करता। वह बड़ा भयानक शाप देने की धमकी दे रहे थे।
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