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कहानी संग्रह >> प्रेमचन्द की कहानियाँ 35 प्रेमचन्द की कहानियाँ 35प्रेमचंद
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प्रेमचन्द की सदाबहार कहानियाँ का पैंतीसवाँ भाग
'राजा साहब इतने न्याय-शून्य हैं कि मेरे पत्र-व्यवहार में रोक-टोक करें?'
'अच्छा! राजा साहब में इतनी आदमीयत है? मुझे तो विश्वास नहीं आता।'
'तुम अब भी अपनी गलती पर लज्जित नहीं हो?'
'मैंने कोई गलती नहीं की। मैं तो ईश्वर से चाहती हूँ कि जो मैंने आज किया, वह बार-बार करने का मुझे अवसर मिले।'
मेहता ने अरुचि के साथ पूछा, तुमने कहाँ जाने का इरादा किया है?
'जहन्नुम में!'
'गलती आप करती हो, गुस्सा मुझ पर उतारती हो?'
'मैं तुम्हें इतना निर्लज्ज न समझती थी!'
'मैं भी इसी शब्द का तुम्हारे लिए प्रयोग कर सकता हूँ।'
'केवल मुख से, मन से नहीं।'
मि. मेहता लज्जित हो गये। जब सुनीता की विदाई का समय आया, तो स्त्री-पुरुष दोनों खूब रोये और एक तरह से सुनीता ने अपनी भूल स्वीकार कर ली। वास्तव में इन बेकारी के दिनों में मेहता ने जो कुछ किया, वही उचित था, बेचारे कहाँ मारे-मारे फिरते।
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