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प्रेमचन्द की कहानियाँ 35

प्रेमचंद

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2017
पृष्ठ :380
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9796

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प्रेमचन्द की सदाबहार कहानियाँ का पैंतीसवाँ भाग


गुरुप्रसाद- अरे तो कुछ बोहनी-बट्टा तो हो जाए।

मस्त- जी नहीं तब तो जलसा होगा। आज दावत होगी।

विनोद- भाग्य के बली हो तुम गुरुप्रसाद!

रसिक- मेरी राय है, जरा उस ड्रामेटिस्ट को गाँठ लिया जाए। उसका मौन मुझे भयभीत कर रहा है।

मस्त- आप तो वाही हुए हैं। वह नाक रगड़कर रह जाए, तब भी  यह सौदा होकर रहेगा। सेठजी अब बचकर निकल नहीं सकते।

विनोद- हम लोगों की भूमिका भी तो जोरदार थी।

अमर- उसी ने तो रंग जमा दिया। अब कोई छोटी रकम कहने का  उसे साहस न होगा।

समाप्त



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