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कहानी संग्रह >> प्रेमचन्द की कहानियाँ 35 प्रेमचन्द की कहानियाँ 35प्रेमचंद
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प्रेमचन्द की सदाबहार कहानियाँ का पैंतीसवाँ भाग
गुरुप्रसाद- अरे तो कुछ बोहनी-बट्टा तो हो जाए।
मस्त- जी नहीं तब तो जलसा होगा। आज दावत होगी।
विनोद- भाग्य के बली हो तुम गुरुप्रसाद!
रसिक- मेरी राय है, जरा उस ड्रामेटिस्ट को गाँठ लिया जाए। उसका मौन मुझे भयभीत कर रहा है।
मस्त- आप तो वाही हुए हैं। वह नाक रगड़कर रह जाए, तब भी यह सौदा होकर रहेगा। सेठजी अब बचकर निकल नहीं सकते।
विनोद- हम लोगों की भूमिका भी तो जोरदार थी।
अमर- उसी ने तो रंग जमा दिया। अब कोई छोटी रकम कहने का उसे साहस न होगा।
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