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धर्म एवं दर्शन >> मानस और भागवत में पक्षी

मानस और भागवत में पक्षी

रामकिंकर जी महाराज

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2017
पृष्ठ :42
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9816

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रामचरितमानस और भागवत में पक्षियों के प्रसंग


पक्षियों के संवाद का अभिप्राय यह है कि मानो भगवत्कथा ही एक ऐसी वस्तु है जिससे विवाद मिट सकता है। भगवत्कथा में एक सांकेतिक सूत्र आता है और वह बड़े महत्व का है कि भगवान् की कथा में किस पक्षी का महत्त्व अधिक है, हंस का या कौए का? हंस से ही प्रारम्भ किया गया। श्रीशुकदेवजी महाराज हंस हैं और श्रीकाकभुशुण्डिजी महाराज कौआ हैं। हंस जो है, वह पक्षियों में श्रेष्ठ है, अत्यन्त वन्दनीय है और कौआ पक्षियों में अत्यन्त निन्दनीय माना जाता है। प्रसंग आता है कि भुशुण्डि शर्मा के अन्तःकरण में भक्ति के संस्कार थे और जन्मजात ही उनके अन्तःकरण में सगुण साकार भक्ति के प्रति पक्षपात था। जब वे अपनी जिज्ञासा लेकर महापुरुषों के पास जाते थे और उनसे प्रश्न करते थे तो वे वेदान्तपरायण महापुरुष उनको वेदान्त का ज्ञान देने की चेष्टा करते थे, लेकिन भुशुण्डि शर्मा की समस्या यह थी कि –

निर्गुन मत मम हृदयँ न आवा। 7/110/7

निर्गुन निराकार ब्रह्म का सिद्धान्त अपने हृदय में धारण नहीं कर पा रहा था। वे माँग लेकर कुछ दूसरी ही जाते थे और महापुरुष उनको देते वह थे कि जिसे वे महापुरुष अच्छा समझते थे। परिणाम यह हुआ कि विवाद हो गया। उन महात्माओं में भी जो श्रेष्ठ महात्मा थे महर्षि लोमश, उनके चरणों में जाकर भुशुण्डि शर्मा ने प्रणाम किया और उनको लगा कि शायद मेरे अन्तःकरण की प्यास यहाँ बुझेगी, तृप्ति मिलेगी। इसलिए जब लोमशजी ने पूछा कि तुम क्या सुनना चाहते हो? तो उन्होंने यही कहा कि –

सगुन ब्रह्म अवराधन मोहि कहहु भगवान। 7/110 घ

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