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जीवनी/आत्मकथा >> सत्य के प्रयोग

सत्य के प्रयोग

महात्मा गाँधी

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2017
पृष्ठ :716
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9824

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महात्मा गाँधी की आत्मकथा


किन्तु आफिस में एक स्थायी शॉर्टहैंड राइटर की आवश्यकता तो थी ही। एक महिला इसके लिए भी मिल गयी। नाम था मिस श्लेशिन। उसे मेरे पास लाने वाले मि. कैलनबैक थे, जिनका परिचय पाठको को आगे चलकर होगा। इस समय यह महिला एक हाईस्कूल में शिक्षिका का काम कर रही थी, उसकी उमर कोई सतरह साल की रही होगी। उसकी कुछ विचित्रताओ से मि. कैलनबैक और मैं हार जाते थे। वह नौकरी करने के विचार से नहीं आयी थी। उस तो अनुभव कमाने थे। उसके स्वभाव में कहीं रंग-द्वेष तो था ही नहीं। उसे किसी की परवाह भी नहीं थी। वह किसी का भी अपमान करने से डरती न थी और अपने मन में जिसके बारे में जो विचार आते, सो कहने में संकोच न करती थी। अपनी इसी स्वभाव के कारण वह कभी कभी मुझे परेशानी में डाल देती थी। लेकिन उसका सरल और शुद्ध स्वभाव सारी परेशानी दूर कर देता था। अंग्रेजी के उसके ज्ञान को मैंने हमेशा अपने से ऊँचा माना था। इस कारण और उसकी वफादारी पर पूरा विश्वास होने के कारण उसके द्वारा टाइप किये गये बहुत से पत्रों पर, उन्हे दुबारा जाँचे बिना ही, मैं हस्ताक्षर करता था।

उसकी त्यागवृत्ति का पार न था। उसने एक लम्बे समय तक मुझ से प्रतिमास सिर्फ छह पौंड ही लिये और दस पौंड से अधिक वेतन लेने से उसने अन्त तक साफ इनकार किया। जब कभी मैं अधिक लेने को कहता, वह मुझे धमकाती और कहती, 'मैं वेतन लेने के लिए यहाँ नहीं रही हूँ। मुझे आपके साथ यह काम करना अच्छा लगता है और आपके आदर्श मुझे पसन्द हैं, इसलिए मैं यहाँ टिकी हूँ।'

एक बार आवश्यकता होने से उसने मुझसे चालीस पौड़ लिये थे, पर कर्ज के तौर पर। पिछले साल उसने वे सारे पैसे लौटा दिये।

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