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शब्द का अर्थ
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उघटना :
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स० [सं० उद्घाटन, प्रा० उग्घाटन] १. किसी का कोई भेद या रहस्य खोलना। प्रकट करना। उदाहरण—धीर वीर सुनि समुझि परस्पर बल उपाय उघटत निज हिय के।—तुलसी। २. आगे पड़ा हुआ परदा या आवरण हटाना। खोलकर सामने रखना या लाना। ३. दबी, बीती या भूली हुई पुरानी बातों की नये सिरे से चर्चा करना। ४. उक्ति या कथन के रूप में उपस्थित करना। कहना। उदाहरण—उघटहिं छन्द प्रबन्ध गीत पर राग तान बन्धान।—तुलसी। ५. अपने किये हुए उपकारों या दूसरों के अपराधों, दोषों आदि की खुलकर चर्चा करना। ६. किसी के पुराने दोषों, पापों आदि की चर्चा करते हुए उन्हें भला-बुरा कहना। निंदा करते हुए गालियाँ देना। उदाहरण—उघटति हौ तुम मात पिता लौ नहि जानौ तुम हमको।—सूर। विशेष—अंतिम दोनों अर्थों में इस शब्द का प्रयोग किसी को ताना देते हुए नीचा दिखाने के लिए होता है। अ० संगीत में, किसी के, गाने-बजाने, नाचने आदि के समय बराबर हर, ताल पर कुछ आघात या शब्द करना। ताल देना। उदाहरण—कोउ गावत कोउ नृत्य करत, कोउ उघटत, कोउ ताल बजावत।—सूर। |
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समानार्थी शब्द-
उपलब्ध नहीं |
उघटना :
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स० [सं० उद्घाटन, प्रा० उग्घाटन] १. किसी का कोई भेद या रहस्य खोलना। प्रकट करना। उदाहरण—धीर वीर सुनि समुझि परस्पर बल उपाय उघटत निज हिय के।—तुलसी। २. आगे पड़ा हुआ परदा या आवरण हटाना। खोलकर सामने रखना या लाना। ३. दबी, बीती या भूली हुई पुरानी बातों की नये सिरे से चर्चा करना। ४. उक्ति या कथन के रूप में उपस्थित करना। कहना। उदाहरण—उघटहिं छन्द प्रबन्ध गीत पर राग तान बन्धान।—तुलसी। ५. अपने किये हुए उपकारों या दूसरों के अपराधों, दोषों आदि की खुलकर चर्चा करना। ६. किसी के पुराने दोषों, पापों आदि की चर्चा करते हुए उन्हें भला-बुरा कहना। निंदा करते हुए गालियाँ देना। उदाहरण—उघटति हौ तुम मात पिता लौ नहि जानौ तुम हमको।—सूर। विशेष—अंतिम दोनों अर्थों में इस शब्द का प्रयोग किसी को ताना देते हुए नीचा दिखाने के लिए होता है। अ० संगीत में, किसी के, गाने-बजाने, नाचने आदि के समय बराबर हर, ताल पर कुछ आघात या शब्द करना। ताल देना। उदाहरण—कोउ गावत कोउ नृत्य करत, कोउ उघटत, कोउ ताल बजावत।—सूर। |
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