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शब्द का अर्थ
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पूरक :
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वि० [सं०√पूर्+णिच्+ण्वुल्—अक] १. पूर्ति करनेवाला। कमी, त्रुटि आदि पर दूर करनेवाला। २. (अंश या मात्रा) जिसके योग से किसी दूसरे तत्त्व या बात में पूर्णता आती हो या किसी प्रकार की पूर्ति होती हो। संपूरक। (कॉम्लिमेन्टरी) ३. किसी के सामने आकर उसकी बराबरी या सामना कर सकनेवाला। उदाहरण-पूरक है तेरा यहाँ एक युधिष्ठिर ही।—मैथिलीशरण। दे० ‘संपूरक’। पुं० १. प्राणायाम विधि के तीन भागों में से पहला भाग जिसमें श्वास को नाक से खींचते हुए अन्दर की ओर ले जाते हैं। २. वे दस पिंड जो हिदुओं में किसी के मरने पर उसके मरने की तिथि से दसवें दिन तक नित्य दिये जाते हैं। कहते हैं कि जब शरीर जल जाता है तब इन्हीं पिंडों से मृत व्यक्ति का पारलौकिक शरीर फिर से बनता है। ३. गणित में वह अंक जिसके द्वारा गुणा किया जाता है। गुणक अंक। ४. बिजौरा नींबू। ५. दे० ‘समायोजक’। |
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समानार्थी शब्द-
उपलब्ध नहीं |
पूरक :
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वि० [सं०√पूर्+णिच्+ण्वुल्—अक] १. पूर्ति करनेवाला। कमी, त्रुटि आदि पर दूर करनेवाला। २. (अंश या मात्रा) जिसके योग से किसी दूसरे तत्त्व या बात में पूर्णता आती हो या किसी प्रकार की पूर्ति होती हो। संपूरक। (कॉम्लिमेन्टरी) ३. किसी के सामने आकर उसकी बराबरी या सामना कर सकनेवाला। उदाहरण-पूरक है तेरा यहाँ एक युधिष्ठिर ही।—मैथिलीशरण। दे० ‘संपूरक’। पुं० १. प्राणायाम विधि के तीन भागों में से पहला भाग जिसमें श्वास को नाक से खींचते हुए अन्दर की ओर ले जाते हैं। २. वे दस पिंड जो हिदुओं में किसी के मरने पर उसके मरने की तिथि से दसवें दिन तक नित्य दिये जाते हैं। कहते हैं कि जब शरीर जल जाता है तब इन्हीं पिंडों से मृत व्यक्ति का पारलौकिक शरीर फिर से बनता है। ३. गणित में वह अंक जिसके द्वारा गुणा किया जाता है। गुणक अंक। ४. बिजौरा नींबू। ५. दे० ‘समायोजक’। |
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