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समाँ  : पुं० [सं० समय] १. समय। वक्त। मुहावरा—समाँ बँधना= (संगीत आदि कार्यो का) इतनी उत्तमता से सम्पन्न होता रहना कि सभी उपस्थित लोग स्तब्ध हो जायँ, और ऐसा जान पड़े कि मानो समय भी उसका आनंद लेने के लिए ठहर या रुक गया है। विशेष—आशय यही है कि लोगों को यह पता नहीं चलने पाता कि इतना अधिक समय कैसे बीत गया। २. ऋतु। ३. जमाना। युग। जैसा—आज-कल ऐसा समाँ आ गया है कि कोई किसी को नहीं सुनता। ४. अवसर। मौका। ५. सुंदर और सुहावना दृश्य। उदाहरण—अजब गंगा के बहने का समां है।—नजीर। बनारसी।
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समांग  : वि० [सं० सम+अंग] जिसके सब अंग या तत्त्व एक से अथवा एक ही प्रकार के हों। विषमांग का विपर्याय। (होमोजीनियस)।
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समांजन  : पुं० [सं०] सुश्रुत के अनुसार आँखों में लगाने का एक प्रकार का अंजन।
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समाँण  : पुं० [सं०] १. श्मशान। २. शव (राज०)। वि०=मसान।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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समांत  : पुं० [सं० ष० त०] १. वर्ष का अन्त। २. पड़ोसी।
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समांतक  : पुं० [सं० समांत+कन्] कामदेव।
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समांशिक  : वि० [सं० समांश+ठन्-इक] १. समान भागोंवाला। २. समान अंग या भाग पाने-वाला।
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