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चाह  : स्त्री० [सं० उत्साह, प्रा० उच्छाह] १. वह मनोवेग जो मनुष्य को ऐसी वस्तु को प्राप्त करने के लिए प्रेरित करता है जिससे उसे संतोष या सुख मिल सकता हो। जैसे–मुझे आपके दर्शनों की चाह थी। २. प्रेम या स्नेहपूर्वक किसी को चाहने की अवस्था या भाव। अनुराग। प्रेम। जैसे–दिल तो तुम्हारी ही चाह है। ३. चाहे जाने की अवस्था या भाव। आवश्यकता। गरज। जरूरत। जैसे–जिसकी यहाँ चाह है, उसकी वहाँ भी चाह है। ४. इस बात की जानकारी या परिचय कि किसे किस चीज की आवश्यकता या चाह है। उदाहरण–सब की चाह लेइ दिन राती।जायसी। ५. दे० चाव। पुं० [फा०] कूआँ। कूप। स्त्री०=चाय।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है) स्त्री० [हिं० चाल=आहट](यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है) १. खबर। समाचार। उदाहरण को सिहल पहुँचावै चाहा।–जायसी। २. टोह। ३. गुप्त भेद। रहस्य।
समानार्थी शब्द-  उपलब्ध नहीं
चाहक  : वि० [हिं० चाहना] १. चाहनेवाला। २. अनुराग या प्रेम करनेवाला।
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चाहत  : स्त्री० [हिं० चाहता] किसी को अनुराग तथा उत्कंठापूर्वक चाहने की अवस्था, क्रिया या भाव। चाह। प्रेम।
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चाहना  : स्त्री० [हिं० चाह] १. ऐसी वस्तु की प्राप्ति अथवा ऐसे कार्य या बात की सिद्धि की इच्छा करना जिससे संतोष या सुख मिल सकता हो। जैसे– कौन नहीं चाहता की मैं धनी हो जाऊँ। २. किसी से कोई चीज लेने या कोई कार्य कर देने की विनयपूर्ण प्रार्थना करना। जैसै–हम तो आपकी की कृपा दृष्टि चाहते हैं। ३. अधिकार या अनधिकार पूर्वक किसी का या किसी से कुछ लेने की उत्कट या उग्र इच्छा व्यक्त करना। जैसे–मेरे भाई तो मेरी जान लेना चाहता है। ४. अनुराग, प्रेम या स्नेहपूर्वक किसी व्यक्ति को अपने पास और सुख से रखने की अभिलाषा या कामना करना। जैसे–माता अपने छोटे पुत्र को बहुत चाहती है। ५. श्रृंगारिक क्षेत्र में, स्त्री के मन में किसी पुरुष के प्रति क्रमात् कामवासना से युक्त अनुराग या प्रेम का भाव होना। जैसे–राजा अपनी छोटी रानी को सबसे अधिक चाहता था। ६. अनुराग, चाह या प्रेम से युक्त होकर किसी की ओर ताकना या देखना। जोहना। उदा०–अली अली की ओट ह्वै चली भली बिधि चाहि।–बिहारी। ७. साधारण रूप से देखना। दृष्टिपात करना। उदा०–चालिया चंदाणी मग चाहि।–प्रिथीराज। स्त्री० चाहने की अवस्था या भाव। जैसे–आपकी चाहना तो यहाँ भी है।
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चाहा  : पुं० [सं० चाष] एक प्रकार का जल-पक्षी जिसका सारा शरीर फूलदार और पीठ सुनहरी होती है। लोग मांस के लिए इसका शिकार करते हैं। यह कई प्रकार का होता है। जैसे–चाहा करमाठी=गर्दन सफेद बाकी सब अंग काले। चाहा चु्क्का=चोंच और पैर लाल; बाकी सब अंग खाकी; चाहा लमगोडा=लम्बी और चितकबरी चोंच वाला। पुं० [हिं० चाहना](यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है) [स्त्री० चाही] वह जिसे चाहा या जिससे प्रेम किया जाय। चहेता। प्रिय।
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चाहि  : अव्य० [सं० चैव=और भी?] बनिस्बत। से। किसी की तुलना में अधिक या बढकर। उदा०–कहँ धनु कुलिसहु चाहि कठोरा।–तुलसी।
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चाहिए  : अव्य० [हिं० चाहना] १. आवश्यकता या जरूरत है। जैसे–हमें वह पुस्तक चाहिए। २. उचित, मुनासिब या वाजिब है। जैसे–आगे से तुमको सँभलकर चलना चाहिए।
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चाही  : वि० [फा० चाह=कूआँ] (खेत) जो कूएँ के पानी से सींचा जाता हो।
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चाहे  : अव्य० [हिं० चाहना] १. ‘यदि जी चाहे’ का सक्षिप्त रूप। यदि जी चाहे। यदि मन में आवे। जैसे–(क) चाहे यहाँ रहो, चाहे वहाँ। (ख) जो चाहे सो करो। २. दो में से किसी एक वरण करने के प्रसंग में, जो इच्छा हो। जो चाहते हो। जैसे–चाहे कपड़ा ले लो, चाहे रुपया। ३. जो कुछ हो सकता हो, वह सब; या उनमें से कुछ। जैसे–चाहे जो हो, तुम वहाँ जरूर जाओ।
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