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संदर्भ  : पुं० [सं०] १. भिन्न-भिन्न तत्वों या वस्तुओं को मिलाकर कोई नया और उपयोगी रूप देना। जैसे—पिरोना, बुनना, सीना आदि। २. बनावट। रचना। ३. पुस्तक लेख आदि में वर्णित प्रसंग, विषय जिसका विचार या उल्लेख हो (कान्टेक्स्ट)। जैसे—यह पद्य ‘रामवनगमन’ संदर्भ का है। ४. किसी गूढ विषय पर लिखा हुआ कोई विवेचनात्मक ग्रन्थ। ५. किसी ग्रन्थ में लिखा हुआ वह पाठ जिसके आधार पर पूर्वापर के विचार से संगति बैठकर उसका अर्थ लगाया जाता है (कान्टेक्स्ट)। जैसे—संदर्भ से तो इसका यही ठीक अर्थ जान पड़ता है। ६. एक ग्रंथ में आयी हुई ऐसी बातें जिसका उपयोग लोग अपनी जानकारी बढ़ाने के लिये या संदेह दूर करने के लिए करते हैं। वि० दे० ‘संदर्भ ग्रन्थ’।
समानार्थी शब्द-  उपलब्ध नहीं
संदर्भ ग्रंथ  : पुं० [सं०] ऐसा ग्रंथ जिसमें जानकारी या विमर्श के लिए कुछ विशिष्ट प्रसंगों की बातें देखी जाती हों। विशेष—ऐसा ग्रंथ आद्योपान्त पढ़ा नहीं जाता बल्कि किसी जिज्ञासा की पूर्ति या संदेह के निवारण के उद्देश्य से देखा जाता है। जैसे—कोश, विश्वकोश, साहित्य कोश आदि संदर्भ के ग्रंथ हैं।
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संदर्भ साहित्य  : पुं० [सं०] साहित्य का वह अंश या वर्ग जिसमें ऐसे बड़े और महत्वपूर्ण ग्रंथ आते हैं जिनमें एक अथवा अनेक विषयों की गूढ़ बातों की पूरी छानबीन और विवेचन होता है। विशेष—ऐसे साहित्य का उपयोग साधारण रूप से पढ़ी जाने वाली पुस्तकों की तरह नहीं बल्कि विशिष्ट अवसरों पर विशेष प्रकार की गंभीर जानकारी प्राप्त करने के लिए ही किया जाता है। जैसे—विश्व कोष, शब्द कोष, विभिन्न जातियों, देशों और साहित्यों के इतिहास आदि (रेफरेन्स बुक्स)।
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संदर्भिका  : स्त्री० [सं० संदर्भ] किसी विशिष्ट विषय से संबंध रखने वाले संदर्भ ग्रंथों की नामावली या सूची (बिब्लियोग्राफ़ी)।
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