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संबोधन  : पुं० [सं०√बुध् (ज्ञान प्राप्त करना)+ल्युट्-अन] [वि० संबोधित, संबोध्य] १. नींद से उठाना। जगाना। २. ज्ञान या बोध कराना। ३. समझाना-बुझाना। ४. आह्वान करना। पुकारना। ५. व्याकरण में वह शब्द जिसमें किसी को पुकारा जाता है। विशेष-भूल से इसकी गिनती कारकों में की जाती है, जबकि यह क्रिया के रूप का साधन नहीं करता। ६. वह स्थिति जिसमें किसी से कुछ कहने के लिए उसके प्रति ध्यान दिया या मुख किया जाता है।
समानार्थी शब्द-  उपलब्ध नहीं
संबोधनगीति  : स्त्री० [सं०] आधुनिक साहित्य में ऐसा विशद जाति काव्य जो किसी को संबोधित करके लिखा गया हो। और उच्च भावनाओं से युक्त हो (ओड)। जैसे—दिनकर कृत ‘हिमालय’ या पंत कृत ‘भावी’ पत्नी के प्रति।
समानार्थी शब्द-  उपलब्ध नहीं
संबोधना  : सं० [सं०] १. समझाना-बुझाना। बोध कराना। ३. ढारस या सान्त्वना देना।
समानार्थी शब्द-  उपलब्ध नहीं
 
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