लोगों की राय

ई-पुस्तकें >> शिवसहस्रनाम

शिवसहस्रनाम

हनुमानप्रसाद पोद्दार

प्रकाशक : गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :16
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 2096

Like this Hindi book 0

भगवान शिव के सहस्त्रनाम...


विश्वरूपो विरूपाक्षो वागीश: शुचिसत्तम:।
सर्वप्रमाणसंवादी वृषाङ्को वृषवाहन:।।६।।

३५ विश्वरूप: - जगत्स्वरूप, ३६ विरूपाक्ष: - विकट नेत्रवाले, ३७ वागीश: - वाणी के अधिपति, ३८ शुचिसत्तम: - पवित्र पुरुषों में भी सबसे श्रेष्ठ, ३९ सर्वप्रमाणसंवादी - सम्पूर्ण प्रमाणों में सामंजस्य स्थापित करनेवाले, ४० वृषाङ्क - अपनी ध्वजा में वृषभ का चिह्न धारण करनेवाले, ४१ वृषवाहन: - वृषभ या धर्म को वाहन बनानेवाले।।६।।

ईश: पिनाकी खट्‌वाङ्गी चित्रवेषश्चिरंतन:।
तमोहरो महायोगी गोप्ता ब्रह्मा च धूर्जटि:।।७।।

४२ ईश: - स्वामी या शासक, ४३ पिनाकी - पिनाक नामक धनुष धारण करनेवाले, ४४ खट्‌वाङ्गी - खाट के पाये की आकृति का एक आयुध धारण करनेवाले, ४५ चित्रवेष: - विचित्र वेषधारी, ४६ चिरंतन: - पुराण (अनादि) पुरुषोत्तम, ४७ तमोहर: - अज्ञानान्धकार को दूर करनेवाले, ४८ महायोगी - महान् योग से सम्पन्न, ४१ गोप्ता - रक्षक, ५० ब्रह्मा - सृष्टिकर्ता, ५१ धूर्जटि: - जटा के भार से युक्त।।७।।

कालकाल: कृत्तिवासा: सुभग: प्रणवात्मक:।
उन्नध्र: पुरुषो जुष्मो दुर्वासा: पुरशासन:।।८।।

५२ कालकाल: - काल के भी काल, ५३ कृत्तिवासा: -गजासुर के चर्म को वस्त्र के रूप में धारण करनेवाले, ५४ सुभग: - सौभाग्यशाली, ५५ प्रणवात्मक: - ओंकार-स्वरूप अथवा प्रणव के वाचार्थ, ५६ उन्नध्र: - बन्धन रहित, ५७ पुरुष: - अन्तर्यामी आत्मा, ५८ जुष्य: -सेवन करनेयोग्य, ५९ दुर्वासा: - 'दुर्वासा' नामक मुनि के रूप में अवतीर्ण, ६० पुरशासन: - तीन मायामय असुरपुरों का दमन करनेवाले।।८।।

दिव्यायुध: स्कन्दगुरु: परमेष्ठी परात्पर:।
अनादिमध्यनिधनो गिरीशो गिरिजाधव:।।९।।

६१ दिव्यायुध: - 'पाशुपत' आदि दिव्य अस्त्र धारण करनेवाले, ६२ स्कन्दगुरु: - कार्तिकेयजी के पिता, ६३ परमेष्ठी - अपनी प्रकृष्ट महिमा में स्थित रहनेवाले, ६४ परात्पर: - कारण के भी कारण, ६५ अनादिमध्यनिधन: - आदि, मध्य और अन्त से रहित, ६६ गिरीश: - कैलास के अधिपति, ६७ गिरिजाधव: - पार्वती के पति।।।।

कुबेरबन्धु: श्रीकण्ठो लोकवर्णोत्तमो मृदु:।
समाधिवेद्य: कोदण्डी नीलकण्ठ: परश्वधी।।१०।।

६८ कुबेरबन्धु: - कुबेर को अपना बन्धु (मित्र) माननेवाले, ६९ श्रीकण्ठ: - श्यामसुषमा से सुशोभित कण्ठवाले, ७० लोकवर्णोत्तम: - समस्त लोकों और वर्णोंसे श्रेष्ठ, ७१ मृदुः - कोमल स्वभाववाले, ७२ समाधिवेद्य: - समाधि अथवा चित्तवृत्तियों के निरोध से अनुभव में आने योग्य, ७३ कोदण्डी - धनुर्धर, ७४ नीलकण्ठ: - कण्ठमें हालाहल विष का नील चिह्न धारण करनेवाले, ७५ परश्वधी - परशुधारी।।१०।।

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book