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उपन्यास >> आशा निराशा

आशा निराशा

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :236
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 7595

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जीवन के दो पहलुओं पर आधारित यह रोचक उपन्यास...


‘‘मैं समझता हूं कि मैत्रेयी जी का यह विचार गलत सिद्ध होगा। वहां के विद्यालयों का वातावरण दिन-प्रतिदिन बिगड़ रहा है। वहां आप इतनी शान्ति नहीं पा सकेंगी जितनी यहां सम्भव है।’’

‘‘इस पर भी मैं अनुभव कर रही हूं कि मेरा काम वहां ही है। कुछ कृत्रिम बन्धन यहां रोक रहे थे। वे अब टूट रहे प्रतीत होते हैं।’’

‘‘मैं अगले सप्ताह भारत जा रहा हूँ। मुझे अपनी अर्जी की एक प्रति दे देना और बताना कि किन-किन स्थानों पर आपने लिखा है।’’

‘‘दे दूँगी।’’

मध्याह्न के भोजन के उपरान्त वह लन्दन म्युज़ियम के पुस्तकालय में चली गई। वहां से रात के भोजन के समय ही लौटी।

अगले दिन उसे अक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार का टेलीफ़ोन आया। मैत्रेयी ने टेलीफ़ोन सुना तो रजिस्ट्रार ने बताया, ‘‘अभी-अभी सैलिसबरी नाम के स्थान से एक रजिस्टर्ड पत्र आपके नाम आया है। भेजने वाले हैं प्रोफ़ेसर विलियम साइमन है।’’

‘‘परन्तु आपको मेरा यहाँ होने का पता किसने दिया है?’’

‘‘पुलिस चौकी में प्रोफ़ेसर साइमन के लापता होने की रिपोर्ट लिखाने एक तेजकृष्ण बागड़िया गया था। वहां उसने अपने दो पते लिखाये थे। मैट्रोपोलियन होटल का और लन्दन का। साथ ही मैट्रो-पोलिटन होटल में मिस्टर बागड़िया ने अपना पता लिखाया था। यह भी होटल से ही पता चला है कि आप बागड़िया के साथ लन्दन गई हैं।’’

‘‘मैं समझ नहीं सकी कि उस पत्र में प्रोफ़ेसर ने क्या लिखा होगा।’’

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