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उपन्यास >> आशा निराशा

आशा निराशा

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :236
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 7595

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जीवन के दो पहलुओं पर आधारित यह रोचक उपन्यास...


‘‘यह तुम जानो और वह जाने। मेरे लिए तुम्हारे प्रति जो स्नेह बन गया है, वह इन बातों से ऊपर है।’’

‘‘मैं रात भर यही सोचती रही हूं कि आपका घर छोड़ दूं।’’

‘‘क्या आवश्यकता है? वह तुम पर बलात्कार नहीं कर सकेगा।’’

‘‘इस वार्त्तालाप को हुए तीन दिन हो चुके थे। करोड़ीमल ने अन्यथा वह धन, इंग्लैंड की सरकार का हो जाएगा। अतः करोड़ीमल की सहायता से मैत्रेयी ने रुपया और ‘शेयर पेपर’ अपने नाम करवा लिये। इस पर भी वह यही समझ रही थी कि जीवन में जब भी कभी साइमन मिला तो उसका धन उसे वापस कर देगी।

करोड़ीमल का यह कहना था कि वह दो वर्ष तक प्रतीक्षा करे। यदि तब तक वह न आये तो उसे यह धन अपने प्रयोग में लाना चाहिए।

मैत्रेयी विचार कर रही थी कि वह पन्द्रह दिन के अवकाश के उपरान्त ऑक्सफ़ोर्ड में जाएगी और एक महीने का नोटिस देकर काम छोड़ देगी। परन्तु तेज को जब से यह पता लगा था कि नज़ीर ने दूसरा विवाह कर लिया है, वह पुनः मैत्रेयी से घुल-मिलकर बातें करने का यत्न करने लगा था। इसी कारण मैत्रेयी ने संशित मन से यशोदा को अपने मन का संशय बताया था।

नित्य रात का भोजन समाप्त कर तेज मैत्रेयी से भारत में उसके लिए काम के विषय में विचार करने के बहाने से, उसे संकेत मात्र से प्रस्ताव करता प्रतीत होने लगा था।

अभी आक्सफोर्ड लौटने में दो दिन थे कि एक रात दस बजे के लगभग तेजृकृष्ण मैत्रेयी के साथ अपनी मां के कमरे में आया और बोला, ‘‘मां! क्षमा करना। तुम्हें इस समय एक कष्ट देने आया हूं।’’

‘‘आओ बैठो।’’ यशोदा ने कहा, और साथ ही मैत्रेयी के मुख पर देखते हुए पूछने लगी, ‘‘परन्तु मैत्रेयी! तुम्हें क्या हुआ है?’’

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