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दो भद्र पुरुष

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :270
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 7642

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दो भद्र पुरुषों के जीवन पर आधारित उपन्यास...


‘‘दोनों उसमें बैठ गए। ताँगे में तो बातचीत का प्रश्न ही नहीं था। फव्वारे पहुँच वे ट्राम में काजी हौज़ जा पहुँचे। वहाँ से फिर बारहखम्भा रोड तक के लिए ताँगा किया। कम्पनी के कार्यालय में जाने से पूर्व सुमित्रा ने कहा, ‘‘तुम जाओ। मेरा तुमसे मिलना-जुलना वर्जित है।’’

‘‘बहुत डरती हो, अपने माता-पिता से?’’

‘‘हाँ, मैं समझती हूँ कि तुमको भी डरना चाहिए। बूआ ने ही तो मुझे ऐसा करने के लिए कहा है?’’

‘‘तुम बी० ए० में पढ़ती हो। मम्मी तो कुछ भी पढ़ी-लिखी नहीं। उसके वचन को भगवान् का वाक्य मान मान बैठी हो!’’

‘‘मेरा विचार है कि वे मुझसे अधिक पढ़ी हैं। केवल उनका विषय दूसरा है।’’

‘‘कस्तूरी विस्मय में उसका मुख देखने लगा तो सुमित्रा ने कहा, ‘‘उन्होंने ‘डौमेस्टिक साइंस’ का गहन अध्ययन किया हुआ है।’’

कस्तूरी की समझ में आया तो वह हँस पड़ा। हँसता हुआ वह एक ओर चला गया। सुमित्रा कम्पनी के कार्यालय में जा पहुँची। आज चरणदास को कुछ काम था, इस कारण वह सुमित्रा की प्रतीक्षा नहीं कर सका। सुमित्रा यदि बस में आती तो समय पर पहुँच जाती। चरणदास चपरासी के पास एक चिट छोड़ गया था कि वह जा रहा है और उसे ताँगे से आ जाना चाहिए।

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