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दो भद्र पुरुष

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :270
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 7642

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दो भद्र पुरुषों के जीवन पर आधारित उपन्यास...


परमेशरी मन में तो प्रसन्न हो रही थी। वह ऐसा काल था जब समधियों की जाति देखी जाती थी, उसका धन नहीं। लड़की वाले तो कभी देखते भी थे कि उनकी लड़की को खाने-पहिनने को क्या मिलेगा, परन्तु लड़के वाले यह विचार करते थे कि घर में ‘लक्ष्मी’ आ रही है। वह किसी रूप में भी आये, सौभाग्य लेकर ही आएगी। परमेशरी यह समझती थी। अब उसके मन के संशय का निवारण हो गया। उसने कहा, ‘‘मैं बात तो कल पक्की कर दूँगी, किन्तु विवाह कब करना होगा?’’

‘‘हाँ, अब तुमने मतलब की बात कही है। गजराज पन्द्रह वर्ष का हो चुका है। मेरा विवाह तो आठ वर्ष की आयु में ही हो गया था।’’

परमेशरी हँस पड़ी। उसको अपने बचपन के उस काल का स्मरण हो आया, जब उसका विवाह हुआ था और वह इस घर में आई थी तो उन दिनों अपने पति से वह इस प्रकार लड़ पड़ती थी जैसे वह उसका कोई भाई हो। उसको हँसते देख गिरधारीलाल ने पूछा, ‘‘क्यों, हँस रही हो?’’

‘‘वे भी क्या दिन थे! कितने मधुर, विषय-वासना का ज्ञान नहीं, फिर भी आनन्ददायक। आपकी माताजी हम दोनों में झगड़ा कराकर स्वयं आनन्द लिया करती थीं।

‘‘एक दिन जब आप मेरी थाली में से मिठाई उठाकर खा गये और मैं आपको भूखा-नंगा कहने लगी तो आप मुझे पीटने के लिए तैयार हो गये थे। तब माताजी ने आपको रोककर कहा था, ‘‘पत्नी को मारने वाला तो पापी कहलाता है।’ यह सुनकर आपका हाथ नीचा हो गया था। मुझे भी माताजी ने कहा था, ‘पति को कहीं भूखा-नंगा कहते हैं? क्षमा माँगो उससे।’’

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