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ग़बन (उपन्यास)

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :544
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8444

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ग़बन का मूल विषय है महिलाओं का पति के जीवन पर प्रभाव


रमा ने कौतुहल से पूछा–वह कौन-सा देश है?

रमेश–इस समय ठीक याद नहीं आता, पर शायद अफ्रीका हो। हमें यह सुनकर अचम्भा होता है; लेकिन अन्य देश वालों के लिए नाक-कान का छिदना कुछ कम अचम्भे की बात न होगी। बुरा मरज़ है, बहुत ही बुरा। वह धन जो भोजन में खर्च होना चाहिए, बाल-बच्चों का पेट काटकर गहनों की भेंट कर दिया जाता है। बच्चों को दूध न मिले, न सही। घी की गंध तक उनकी नाक में न पहुँचे, न सही। मेवों और फलों के दर्शन उन्हें न हों, कोई परवा नहीं; पर देवीजी गहनें जरूर पहनेंगी और स्वामी जी गहने ज़रूर बनवायेंगे। दस-दस, बीस-बीस रुपये पाने वाले क्लर्कों को देखता हूँ, जो सड़ी  हुई कोठरियों में पशुओं की भाँति जीवन काटते हैं, जिन्हें सवेरे का जलपान तक मयस्सर नहीं होता, उन पर भी गहनों की सनक सवार रहती है, इस प्रथा से हमारा सर्वनाश होता जा रहा है। मैं तो कहता हूँ यह गुलामी पराधीनता से कहीं बढ़कर है। इसके कारण हमारा कितना आत्मिक, नैतिक, दैहिक आर्थिक और धार्मिक पतन हो रहा हैं। इसका अनुमान ब्रह्मा भी नहीं कर सकते।

रमानाथ–मैं तो समझता हूँ, ऐसा कोई भी देश नहीं, जहाँ स्त्रियाँ गहने न पहनती हों। क्या योरोप में गहनों का रिवाज नहीं है?

रमेश–तो तुम्हारा देश योरोप तो नहीं है। वहाँ के लोग धनी हैं। वह धन लुटायें उन्हें शोभा देता है। हम दरिद्र हैं, हमारी कमाई का एक पैसा भी फजूल न खर्च होना चाहिए।

रमेश बाबू इस वाद-विवाद में शतरंज भूल गये। छुट्टी का दिन था ही, दो-चार मिलने वाले आ गये, रमानाथ चुपके से खिसक आया। इस बहस में एक बात ऐसी थी, जो उसके दिल में बैठ गयी। उधार गहने लेने का विचार उसके मन से निकल गया। कहीं वह जल्दी रुपया न चुका सका, तो कितनी बड़ी बदनामी होगी। सराफे तक गया अवश्य; पर किसी दूकान में जाने का साहस न हुआ। उसने निश्चय किया, अभी तीन-चार महीने तक गहनों का नाम न लूँगा।

वह घर पहुँचा, तो नौ बज गये थे। दयानाथ ने उसे देखा तो पूछा–आज सवेरे-सवेरे कहाँ चले गये थे?

रमानाथ–जरा बड़े बाबू से मिलने गया था।

दयानाथ–घंटे आध घंटे के लिए पुस्तकालय क्यों नहीं चले जाया करते। गपशप में दिन गँवा देते हो। अभी तुम्हारी पढ़ने लिखने की उम्र है। इम्तहान न सही, अपनी योग्यता तो बढ़ा सकते हो। एक सीधा-सा खत लिखना पड़ जाता है, तो बगलें झाँकने लगते हो। असली शिक्षा स्कूल छोड़ने के बाद ही शुरू होती है, और वही हमारे जीवन में काम भी आती है। मैंने तुम्हारे विषय में कुछ ऐसी बातें सुनी हैं, जिनसे मुझे बहुत खेद हुआ है और तुम्हें समझा देना मैं अपना धर्म समझता हूँ। मैं यह हरगिज नहीं चाहता कि मेरे घर में हराम की एक कौड़ी भी आये। मुझे नौकरी करते तीस साल हो गये। चाहता तो अब तक हजारों रुपये जमा कर लेता; लेकिन मैं कसम खाता हूँ कि कभी एक पैसा भी हराम का नहीं लिया। तुममें यह आदत कहाँ से आ गयी, यह मेरी समझ में नहीं आता।

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