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गुप्त धन-2 (कहानी-संग्रह)

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :467
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8464

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प्रेमचन्द की पच्चीस कहानियाँ


इन शब्दों में व्यंग भरा हुआ था, जिसका आशय यह था कि मैंने लुईसा के प्रेमी की जान ली। इसकी सच्चाई से कौन इन्कार कर सकता है। इसके प्रायश्चित की अगर कोई सूरत थी तो यहीं कि लुईसा की इतनी खातिरदारी, इतनी दिलजोई करूँ, उस पर इस तरह न्यौछावर हो जाऊं कि उसके दिल से यह दुख निकल जाय।

इसके एक महीने बाद शादी का दिन तय हो गया। हमारी शादी भी हो गयी। हम दोनों घर आय। दोस्तों की दावत हुई। शराब के दौर चले। मैं अपनी खुशनसीबी पर फूला नहीं समाता था और मैं ही क्यों मेरे इष्टमित्र सब मेरी खुशकिस्मती पर मुझे बधाई दे रहे थे।

मगर क्या मालूम था तक़दीर मुझे यों सब्ज बाग दिखा रही है, क्या मालूम था कि यह वह रास्ता है, जिसके पीछे जालिम शिकारी का जाल बिछा हुआ है। मैं तो दोस्तों की ख़ातिर-तवाजों में लगा हुआ था, उधर लुईसा अन्दर कमरे में लेटी हुई इस दुनिया से रुखसत होने का सामान कर रही थी। मैं एक दोस्त की बधाई का धन्यावाद दे रहा था कि राजर्स ने आकर कहा– किरपिन, चलो लुईसा तुम्हें बुला रही है। जल्द। उसकी न जाने क्या हालत हो रही है। मेरे पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। दौड़ता हुआ लुईसा के कमरे में आया।

कप्तान नाक्स की आँखों से फिर आँसू बहने लगे, आवाज़ फिर भारी हो गयी। ज़रा दम लेकर उन्होंने कहा– अन्दर जाकर देखा तो लुईसा कोच पर लेटी हुई थी। उसका शरीर ऐंठ रहा था। चेहरे पर भी उसी ऐंठन के लक्षण दिखाई दे रहे थे। मुझे देखकर बोली– किरपिन, मेरे पास आ जाओ। मैंने शादी करके अपना वचन पूरा कर दिया। इससे ज़्यादा मैं तुम्हें कुछ और न दे सकती थी क्योंकि मैं अपनी मुहब्बत पहले ही दूसरे की भेंट कर चुकी हूँ, मुझे माफ करना मैंने जहर खा लिया है और बस कुछ घड़ियों की मेहमान हूँ।

मेरी आँखों के सामने अँधेरा छा गया। दिल पर एक नश्तर-सा लगा। घुटने टेककर उसके पास बैठ गया। रोता हुआ बोला– लुईसा, यह तुमने क्या किया! हाय! क्या तुम मुझे दग़ा देकर जल्दी चली जाओगी, क्या अब कोई तदबीर नहीं है?

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