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गुप्त धन-2 (कहानी-संग्रह)

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :467
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8464

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प्रेमचन्द की पच्चीस कहानियाँ


फ़ौरन दौड़कर एक डाक्टर के मकान पर गया। मगर आह जब तक उसे साथ लेकर आऊँ मेरी वफ़ा की देवी, सच्ची लुईसा हमेशा के लिए मुझसे जुदा हो गयी थी। सिर्फ़ उसके सिरहाने एक छोटा-सा पुर्ज़ा पड़ा हुआ था जिस पर उसने लिखा था, अगर तुम्हें मेरा भाई श्रीनाथ नज़र आये तो उससे कह देना, लुईसा मरते वक़्त भी उसका एहसान नहीं भूली।

यह कहकर नाक्स ने अपनी वास्केट की जेब से एक मख़मली डिबिया निकाली और उसमें से काग़ज़ का एक पुर्जा निकालकर दिखाते हुए कहा– चौधरी, यही मेरे उस अस्थायी सौभाग्य की स्मृति है जिसे आज तक मैंने जान से ज़्यादा संभाल कर रखा है आज तुमसे परिचय हो गये होगे, मगर शुक्र है कि तुम जीते-जागते मौजूद हो। यह अमानत तुम्हारे सुपुर्द करता हूँ। अब अगर तुम्हारे जी में आये तो मुझे गोली मार दो, क्योंकि उस स्वर्गिक जीव का हत्यारा मैं हूँ।

यह कहते-कहते कप्तान नाक्स फैलकर कुर्सी पर लेट गये। हम दोनों ही की आँखों से आँसू जारी थे मगर जल्दी ही हमें अपने तात्कालिक कर्तव्य की याद आ गयी। नाक्स को सान्त्वना देने के लिए मैं कुर्सी से उठकर उनके पास गया, मगर उनका हाथ पकड़ते ही मेरे शरीर में कंपकंपी-सी आ गयी। हाथ ठंडा था। ऐसा ठंडा जैसा आख़िरी घड़ियों में होता है। मैंने घबराकर उनके चेहरे की तरफ़ देखा और डाक्टर चन्द्र को पुकारा। डाक्टर साहब ने आकर फौरन उनकी छाती पर हाथ रखा और दर्द-भरे लहजे में बोले– दिल की धड़कन बन्द हो गयी।

उसी वक्त बिजली कड़कड़ा उठी, कड़…कड़…कड़…

–  ‘प्रेमचालीसी’ से
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