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उपन्यास >> कायाकल्प

कायाकल्प

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :778
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8516

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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....


मुंशीजी–तो और क्या भाग्यहीन हूँ? जिसके ऐसा देवरूप पोता हो, ऐसी देवकन्या-सी बहू हो, मकान हो, ज़ायदाद हो, चार को खिलाकर खाता हो, क्या वह अभागा है? जिसकी इज़्ज़त आबरू से निभ जाए, जिसका लोग यश गाते हों, वही भाग्यवान् है। धन गाड़ लेने से ही कोई भाग्यवान् नहीं हो जाता।

आज राजा साहब के यहाँ भी उत्सव था, इसलिए शंखधर इच्छा रहते हुए भी न ठहर सके।

स्त्रियाँ निर्मला के चरणों को अंचल से स्पर्श करके विदा हो गईं, शंखधर खड़े हो गए निर्मला ने रोते हुए कहा–कल मैं तुम्हारी बाट देखती रहूँगी।

शंखधर ने कहा–अवश्य आऊँगा।

जब मोटर पर बैठ गए, तो निर्मला द्वार पर खड़ी होकर उन्हें देखती रही। शंखखर के साथ उसका हृदय भी चला जा रहा था। युवकों के प्रेम में उद्विग्नता होती है, बृद्धों का प्रेम हृदय-विदारक होता है। युवक जिससे प्रेम करता है, उससे प्रेम की आशा भी रखता है। अगर उसे प्रेम के बदले प्रेम न मिले, तो वह प्रेम को हृदय से निकालकर फेंक देगा। वृद्ध जनों की भी क्या वही आशा होती है? वे प्रेम करते हैं और जानते हैं कि इसके बदले उन्हें कुछ न मिलेगा। या मिलेगी, तो दया। शंखधर की आँखों में आँसू न थे, हृदय में तड़प न थी, वह यों प्रसन्नचित्त चले जा रहे थे, मानों सैर करके लौटे जा रहे हों।

मगर निर्मला का दिल फटा जाता था और मुंशी वज्रधर की आँखों के सामने अँधेरा छा रहा था।

५३

कई दिन गुज़र गए। राजा साहब हरि भजन और देवोपासना में व्यस्त थे। इधर ४-६ वर्ष से उन्होंने किसी मन्दिर की तरफ़ झाँका भी न था। धर्म-चर्चा का बहिष्कार सा कर रखा था। रियासत में धर्म की खाता ही तोड़ दिया गया था। जो कुछ धार्मिक जीवन था, वह वसुमती के दम से। मगर अब एकाएक देवताओं से राजा साहब की फिर श्रद्धा हो आई थी। धर्मखाता फिर खोला गया और जो तृत्तियाँ बन्द कर दी गई थीं, वे फिर से बाँधी गईं। राजा साहब ने फिर चोला बदला। वह धर्म या देवता किसी के साथ निःस्वार्थ प्रेम नहीं रखते थे। जब संतान की ओर से निराशा हो गई, तो उनका धर्मानुराग भी शिथिल हो गया। जब अहिल्या और शंखधर ने उनके जीवन-क्षेत्र में पदार्पण किया, तब फिर धर्म और दान-व्रत की ओर उनकी रुचि हुई। जब शंखधर चला गया और ऐसा मालूम हुआ कि अब उनके लौटने की आशा ज़ोर-शोर से प्रतिरोध भी करने लगे। धर्मसंगत बातों को चुन-चुनकर बन्द किया। अधर्म की बातें चुन-चुनकर ग्रहण कीं। शंखधर के लौटते ही उनका धर्मानुराग फिर जागृत हो गया। सम्पत्ति मिलने पर ही तो रक्षकों की आवश्यकता होती है।

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