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उपन्यास >> कायाकल्प

कायाकल्प

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :778
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8516

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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....


शंखधर की विचित्र दशा थी। भीतर भय था, बाहर इच्छा। मन पीछे हटता था। पैर आगे बढ़ते थे। उसने बिजली का बटन दबाकर कहा–लक्ष्मी बिना बुलाए नहीं आती प्रिये! कभी नहीं। उपासक का हृदय अव्यक्त रूप से नित्य उसकी कामना करता ही रहता है। वह मुँह से कुछ न कहे; पर उसके रोम-रोम से आह्वान के शब्द निकलते हैं।

देवप्रिया की चिरक्षुधित प्रेमाकांक्षा आतुर हो उठी। अनन्त वियोग से तड़पता हुआ हृदय आलिंगन के लिए चीत्कार करने लगा। उसने अपना सिर शंखधर के वक्ष स्थल पर रख दिया और दो बाँहें उसके गले में डाल दीं। कितना कोमल, कितना मधुर, कितना अनुरक्त स्पर्श था! शंखधर प्रेमोल्लास से विभोर हो गया। उसे जान पड़ा कि पृथ्वी नीचे काँप रही है और आकाश ऊपर उड़ा जाता है। फिर ऐसा हुआ कि वज्र बड़े वेग से उसके सिर पर गिरा।

वह मूर्च्छित हो गया।

देवप्रिया के अंतःकरण में फिर आवाज़ आयी– ‘सर्वनाश! सर्वनाश! सर्वनाश।’ घबराकर बोली–प्रियतम, तुम्हें क्या हो गया? हाय! तुम कैसे हुए जाते हो? हाय! मैं जानती कि मुझ पापिनी के कारण तुम्हारी यह दशा होगी, तो अंतकाल तक वियोगाग्नि में जलती रहती; पर तुम्हारे निकट न आती। प्यारे, आँखें खोलो, तुम्हारी कमला रो रही है।

शंखधर ने आँखें खोल दीं। उनमें अकथनीय शोक था, असहनीय वेदना थी अपार तृष्णा थी।

अत्यंत क्षीण स्वर से बोला–प्रिये! फिर मिलेंगे। यह लीला उस दिन समाप्त होगी, जब प्रेम में वासना न रहेगी।

चाँदनी अब भी छिटकी हुई थी। वृक्षों के नीचे अब भी चाँदनी का जाल बिछा हुआ था। जल क्षेत्र में अब भी चाँदनी नाच रही थी। वायु-संगीत अब भी प्रवाहित हो रहा था, पर देवप्रिया के लिए चारों ओर अंधकार और शून्य हो गया था।

सहसा राजा विशालसिंह द्वार पर आकर खड़े हो गए।

देवप्रिया ने विलाप करके कहा–हाय नाथ! तुम मुझे छोड़कर कहाँ चले गये? क्या इसीलिए, इसी क्षणिक मिलाप के लिए मुझे हर्षपुर लाये थे?

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