उपन्यास >> निर्मला (उपन्यास) निर्मला (उपन्यास)प्रेमचन्द
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अद्भुत कथाशिल्पी प्रेमचंद की कृति ‘निर्मला’ दहेज प्रथा की पृष्ठभूमि में भारतीय नारी की विवशताओं का चित्रण करने वाला एक सशक्तम उपन्यास है…
पर उसने हँसकर कहा–मुंशी जी यह कचहरी नहीं, स्कूल है; हेडमास्टर साहब के कानों में इसकी भनक पड़ गयी, तो जाने से बाहर हो जाएंगे और मंसाराम को खड़े-खड़े निकाल देंगे। संभव है, अफसरों से शिकायत कर दें। बेचारे मुंशीजी अपना-सा मुँह लेकर रह गये। दस बजते-बजते झुँलझाये हुए घर लौटे। मंसाराम उसी वक्त घर से स्कूल जाने को निकला। मुंशीजी ने कठोर नेत्रों से उसे देखा, मानों वह उनका शत्रु हो और घर में चले गये।
इसके बाद दस बारह दिनों तक वकील साहब का यही नियम रहा कि कभी सुबह, कभी शाम, किसी-न- किसी स्कूल के हेडमास्टर से मिलते और मंसाराम को बोर्डिंग हाउस में दाखिल कराने की चेष्टा करते; पर किसी स्कूल में जगह न थी। सभी जगहों से कोरा जवाब मिल गया। अब दो ही उपाय थे-या तो मंसाराम को अलग किराये के मकान में रख दिया जाय या किसी दूसरे स्कूल में भर्ती करा दिया जाय, यह दोनों बातें आसान थीं। मुफस्सिल के स्कूलों में जगह अक्सर खाली रहती थी! लेकिन अब मुंशी जी का शंकित हृदय कुछ शान्त हो गया था। उस दिन से उन्होंने मंसाराम को कभी घर में जाते न देखा।
यहाँ तक कि अब वह खेलने भी न जाता था। स्कूल जाने के पहले और आने के बाद बराबर अपने कमरे में बैठा रहता। गर्मी के दिन थे, खुले हुए मैदान में भी देह से पसीने की धारें निकलती थीं; लेकिन मंसाराम अपने कमरे से बाहर न निकलता उसका आत्माभिमान आवारापन के आपेक्ष से मुक्त होने के लिए विकल हो रहा था। वह अपने आचारण से इस कलंक को मिटा देना चाहता था।
एक दिन मुंशीजी बैठे भोजन कर रहे थे, कि मंसाराम भी नहाकर खाने आया, मुंशी ने इधर उसे महीनों से नंगे बदन न देखा था। आज उस पर निगाह पड़ी तो होश उड़ गये। हड्डियों का ढाँचा सामने खड़ा था। मुख पर अब भी ब्रह्मचर्य का तेज था; पर देह घुलकर काँटा हो गयी थी पूछा-आजकल तुम्हारी तबियत अच्छी नहीं है, क्या? इतने दुर्बल क्यों हो?
मंसाराम ने धोती ओढ़कर कहा–तबीयत तो बिलकुल अच्छी है।
मुंशीजी–फिर इतने दुबले क्यों हो?
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