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उपन्यास >> पाणिग्रहण

पाणिग्रहण

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :651
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 8566

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संस्कारों से सनातन धर्मानुयायी और शिक्षा-दीक्षा तथा संगत का प्रभाव


रजनी ने कहा, ‘‘जब इन्द्र यूरोप जाने लगा तो काका ने अपने मन में वहाँ जाने की उपयोगिता पर सन्देह प्रकट किया था, परन्तु काकी का कहना था कि ज्ञान प्राप्त करने में कुछ हानि नहीं है। इस पर काका ने कहा था, ‘‘ज्ञान-विज्ञान की बात नहीं कर रहा। मैं तो यह कह रहा हूँ कि आचार-रहित देश में जाकर क्या वह निर्मल लौट सकेगा?’ इस पर काकी ने कहा था, ‘‘इन्द्र की बहू का सौन्दर्य सब खराबियों को धो डालेगा, वह उसको अपनी मुट्ठी में बन्द रखेगी।’

काका को तुम्हारी शक्ति पर सन्देह था, परन्तु काकी तुम पर बहुत भरोसा किये हुए थी। उसका कहना था कि शारीरिक सौन्दर्य के अतिरिक्त भी तो तुम स्वभाव, चरित्र बुद्धि में किसी से कम नहीं हो।’’

‘‘ऐना तो मुझको क्लब के जीवन से बहुत डरा गयी है।’’

‘‘उसने ठीक ही कहा है। मेरा भी यही कहना है कि इन्द्र को क्लब छोड़ देना चाहिये। मैंने एक बार उससे कहा था, परन्तु वह माना नहीं।

‘‘इसी कारण मेरा चित्त उससे अब मिलने को नहीं करता। उस दिन ऐना आई तो मैंने उसको कहा था कि वही तुमको मिलकर कोई उपाय करने के लिये कहे।’’

‘‘ऐना ने एक मिसेज बिन्द्रा की बात बताई थी। भगवान् जाने वह बात कहाँ तक ठीक है। यदि ठीक है तो बहुत ही बुरी बात है।’’

‘‘मुझको भी उसने बताई है। उसने यह बी बताया है कि तुमको खराब करने वाले के लिए एक हजार रुपया इनाम निश्चित किया गया है। यदि यह सत्य है तो क्लब में तुम लोगों का जाना भय से रहित नहीं। सज्जन लोगों को दुर्जनों से दूर ही रहना चाहिए।’’

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