लोगों की राय

उपन्यास >> पाणिग्रहण

पाणिग्रहण

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :651
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 8566

Like this Hindi book 9 पाठकों को प्रिय

410 पाठक हैं

संस्कारों से सनातन धर्मानुयायी और शिक्षा-दीक्षा तथा संगत का प्रभाव


‘‘नहीं, पहले ही यह बात बहुत देर तक स्थगित हो चुकी है।’’

‘‘तो आओ। भीतर आ जाओ।’’

‘‘दोनों ड्राइंग-रूम में जा बैठे। रजनी ने पूछा, शारदा को तुम रख नहीं सके, क्यों?’’

‘‘मैंने उसको नहीं निकाला। वह स्वेच्छा से गई है। एक भूल मुझसे हुई है। परन्तु उसके लिए मैं उससे क्षमा माँगने को तैयार हूँ। जाने से पहले दिन वह मुझको क्लब जाने से रोक रही थी। मैंने उसको क्रोध में आकर एक चपत लगा दी थी।’’

यह सुनकर तो रजनी का रक्तचाप बढ़ गया। उसका मुख क्रोध से लाल हो गया। उसने कह दिया, ‘‘तो तुमने उसको पीटा है? बड़े दुष्ट हो इन्द्र! मैं नहीं जानती थी कि साँप पाला जा रहा है।’’ इतना कह वह उठी और बोली, ‘‘बस, मेरी बात हो गई हैं। मैं चलती हूँ।’’

‘‘इन्द्र ने कहा, ‘‘मैं उससे क्षमा माँगने के लिए तैयार हूँ।’’

रजनी ने कहा, ‘‘देखो इन्द्र! तुमको स्मरण होगा कि पिछले वर्ष पिताजी ने तुम्हारे इस पद पर नियुक्त होने के उपलक्ष में चाय-पार्टी दी थी। उसी सायंकाल मैंने तुमको एक बेंत की छड़ी को मोड़ने के लिए कहा था। तुमने उस छड़ी को जब सीमा से अधिक मोड़ा था तो वह छड़ी टूट गई थी। मैंने उस छड़ी की मरम्मत करवाकर रखी है। इस पर भी वह पहले की तरह मजबूत नहीं रही।

‘‘तुमने अपनी पत्नी के संतोष को सीमा से अधिक मोड़ा है। वह टूट गई है। अब जोड़ लगाना हो तो जाकर लगाओ, परन्तु आशा नहीं कि वह पूर्ववत् सुदृढ़ होगी।’’ इतना कहकर रजनी ने कह दिया, ‘‘अब मैं जा रही हूँ। मैंने भारी भूल की है, जो कभी तुमको अपना भाई कहा था।’’

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book