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असंभव क्रांति

ओशो

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :405
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9551

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माथेराम में दिये गये प्रवचन

हम तो एक पलायनवादी दृष्टि में, एक एस्केपिस्ट दृष्टि के अंतर्गत बड़े हुए हैं। और हमने भागते हुए आदमी को आदर दिया है। इस आदर से जितना अमंगल हुआ है, उसकी कल्पना करनी भी कठिन है।

मैं ऐसे संन्यास, ऐसे संन्यासी के पक्ष में नहीं हूँ। मेरी तो समझ यही है कि जीवन के अतिरिक्त और कोई परमात्मा नहीं। यह जो विराट जीवन है, सब तरफ अनंत तक छाया और फैला हुआ, यह जो हम में, और आप में, और पत्तों में, और पक्षियों में, और पत्थरों में, और आकाश के तारों में--यह जो विराट जीवन सब तरफ प्रगट होता है, इसी जीवन की समग्रता का नाम परमात्मा है।

इस जीवन की समग्रता में जो अपने को इस भांति खो देता है, अपने अहंकार को--कि उसे इससे कोई पृथकता की दीवाल नहीं रह जाती, उसके बीच और जीवन के बीच कोई फासला, कोई डिस्टेंस नहीं रह जाता। क्योंकि एक ही फासला है--अहंकार का, और कोई फासला है भी नहीं। एक मनुष्य और दूसरे मनुष्य के बीच भी अहंकार का फासला है। एक जीवन और समस्त जीवन के बीच भी अहंकार का फासला है। सामान्यतः संन्यासी मैं उसे कहना चाहूँगा, जिसने इस फासले को पार कर लिया। जिसके और जीवन के बीच अब कोई फासला नहीं है। लेकिन ऐसा आदमी जीवन से भागेगा नहीं, ऐसा आदमी तो परिपूर्ण रूप से जीवन में सम्मिलित हो जाएगा। जीवन का सब कुछ उसे स्वीकार हो जाएगा। अब वह है ही नहीं--अस्वीकार कौन करे, भागे कौन, और भागे तो कहाँ भागे अब तो वह जीवन से एक है। जीवन से एकता की अनुभूति धार्मिक चित्त की आधारशिला है। जो उस अनुभूति को उपलब्ध होता है, उसे मैं संन्यासी कहूँगा।

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