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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
मैं घर पहुँचा तो सेवक ने मेरा सामान रथ पर से उतारकर रख दिया। मैं ब्राह्मण को घर के भीतर ले गया। वहाँ उसको आदर से बैठाकर पूछने लगा, ‘‘हाँ, तो अपना परिचय दीजिये?’’
अपना परिचय देने की अपेक्षा उसने कहा, ‘‘स्नानागर किधर है? स्नान, सन्ध्योपासना करना चाहता हूँ। तदनन्तर आपको मेरा परिचय मिल जायेगा।’’
मैंने सेवक को बुलाकर उसके साथ लगा दिया और स्वयं भीष्मजी से मिलने के लिए चला गया।
भीष्मजी से मैंने मथुरा की पूर्ण स्थिति वर्णन कर दी। पहले तो उनको विस्मय हुआ कि कैसे एक भाई अपनी बहन को बन्दी-गृह में डाल सकता है? जब मैंने बताया कि कंस ने यह स्वीकार किया है और यह भी माना है कि वह उसके बच्चों को मारता रहा है तो भीष्मजी को क्रोध चढ़ आया। उस समय तो उन्होंने यह कहा, ‘‘ऐसे दुष्टात्मा को पकड़कर सूली पर चढ़ा देना चाहिए।’’
मेरा निवेदन यह था, ‘‘इसके लिए मथुरा पर आक्रमण करना होगा। कंस के पास दस सहस्त्र सुभट्ट सदा युद्ध के लिए तत्पर रहते हैं।
हमको इससे अधिक संख्या में सुभट् भेजने होंगे।’’
‘‘तो यह क्या कठिन है हमारे लिए?’’
‘‘नहीं महाराज! मैं कठिनाई की बात नहीं कर रहा। मैं तो प्रबन्ध की बात कर रहा हूँ। आज तक हमारे जितने भी युद्ध हुए हैं, वे आपने किये हैं अथवा पांडु ने संचालित किये है। आपको इस छोटे-से राज्य के विरुद्ध कष्ट करना शोभा नहीं देता और पांडु यहाँ हैं नहीं। कदाचित् वे रण-क्षेत्र में उतारना पसन्द भी नहीं करेंगे। अतः आपको कोई अन्य महारथी ढूँढ़ना होगा, जो इतनी बड़ी सेना का युद्ध में संचालन कर सके।’’
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