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एक नदी दो पाट

गुलशन नन्दा

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :323
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9560

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'रमन, यह नया संसार है। नव आशाएँ, नव आकांक्षाएँ, इन साधारण बातों से क्या भय।


19


'साहब!...साहब!...एक आना...गरीब के पेट के लिए...साहब, बड़ा साहब बने! दया की भीख, साहब! साहब, बड़ा साहब बने! भूखी हूँ-दो दिन से कुछ नहीं खाया, साहब!'

विलियम जैसे ही क्लब से लौटकर अपने घर की ओर जा रहा था, उसके कानों में बार-बार किसी पतले स्वर ने यह कहना आरम्भ कर दिया। आज वह अपनी सुध में न था। विजय की खुशी में उसने अधिक पी ली थी। क्लब के नाच-रंग अभी तक उसके मस्तिष्क पर छा रहे थे और वह उसी ताल पर नाचता, उखड़े हुए पाँव उठाता बढ़ता जा रहा था।

कम्पनी के घड़ियाल ने रात के एक बजने की सूचना दी और वह फिर चौंक गया। वह लड़की अब भी 'साहब...साहब' की रट लगाती उसके साथ बढ़ती आ रही थी।

'साहब, भूख से मर गई...साहब! बस, एक आना...साहब, भगवान् आपको बड़ा साहब बनाए!'

वह चलते-चलते रुक गया और डिनर-सूट की बो को ढीला करते हुए मुड़ा। माँगने वाली कोई साधारण भिखमंगी न थी। उसके सामने रजनिया हाथ फैलाए खड़ी थी। उसकी आँखों में निराशा और भय झलक रहा था।

विलियम नशे में इतना चूर होते हुए भी उसे तुरन्त पहचान गया। यह वही लड़की थी जो एक शाम उससे डरकर भाग निकली थी। यों बस्ती की सब लड़कियाँ उसके संकेत पर नाचती थीं; परन्तु एक रजनिया थी जो उससे कोसों दूर भागती थी। उसने घूरकर चारों ओर देखा। दूर तक किसी व्यक्ति का नाम-निशान न था। पूर्णिमा की चाँदनी में वातावरण की हर चीज़ निखरी और स्पष्ट दिखाई दे रही थी।

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