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एक नदी दो पाट

गुलशन नन्दा

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :323
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9560

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'रमन, यह नया संसार है। नव आशाएँ, नव आकांक्षाएँ, इन साधारण बातों से क्या भय।


'तो क्या लोगी?' एक लम्बी ध्वनि डकार के साथ निकालते हुए बोला।

'एक रुपया...कपड़े और मिठाइयाँ भी।'

विलियम एक भद्दी हँसी हँसा और एक कोने में रखे ग्रामोफोन पर अंग्रेज़ी गाने का रिकार्ड चढ़ा दिया। अंग्रेज़ी नाच की ध्वनि से कमरा गूँज उठा। उसी ताल पर पाँव उठाता हुआ वह दूसरी अलमारी की ओर बढ़ा और उसमें से एक फ़र का कोट और बिस्कुट का डिब्बा निकालकर रजनिया की ओर फैंका और पास आते हुए बोला-'यह लो पाँच रुपये।'

उसके हाथ में पाँच रुपये का नोट और आँखों में झलकती हुई कुवासनाएँ देखकर रजनिया सिर से पैर तक काँप गई। उसने घबराई हुई आँखों से छत की ओर देखा। रोशनदान से लगी हुई दो आँखें उसकी ओर झाँक रही थीं। उसके मन में झट साहस आ गया और उसने बढ़कर विलियम के हाथ से पाँच रुपये का नोट ले लिया। नोट लेकर दूसरे हाथ से बिस्कुट और फ़र का कोट सँभालते हुए उसने कृतज्ञ दृष्टि से विलियम को देखा और उसके सामने कुछ झुकते हुए बोली-'साहब, सलाम! साहब बड़ा साहब बने! साहब की आयु लाख बरस की हो!' यह कहकर वह मुस्कराई और सलाम करके किवाड़ की ओर बढ़ी। विलियम ने झट से बढ़कर उसे बाँह से पकड़ लिया। वह कांप गई और हाथ में पकड़ी चीज़ें फर्श पर बिखर गईं। घबराहट में वह अपना फूला हुआ साँस ठीक करते हुए बोली, 'साहब, यह क्या?'

'तो चली जाओगी क्या?'

'और क्या?'

'ऊँहूँ, इतना कुछ दिया, मुझे कुछ न दोगी?'

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