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एक नदी दो पाट

गुलशन नन्दा

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :323
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9560

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'रमन, यह नया संसार है। नव आशाएँ, नव आकांक्षाएँ, इन साधारण बातों से क्या भय।


'हाँ...यह नहीं होगा! इन्हें अपना नेता कोई इन्सान चाहिए! इन्सान के वेश में भेड़िया नहीं।' विनोद ने विलियम और कम्पनी के शेष अफसरों का ध्यान इन शब्दों की ओर दिलाते हुए कहा और स्टेज से नीचे उतर गया।

पंडाल में मौन छा गया। वह भीड़ को चीरता हुआ निकला और सब लोग उसके पीछे हो लिए। थोड़े ही समय में बाग खाली हो गया। विलियम अभी तक स्टेज पर विस्मित खड़ा था। सब अफसर गाड़ियों में बैठकर चले गए।

माधवी स्टेज से उतरकर नीचे आने लगी तो विलियम ने उसे रोकते हुए कहा-'आप मेरा एक सन्देशा दे सकेंगी?'

'क्या? किसे?' उसने आश्चर्य से पूछा।

'अपने पति को।'

'जी!'

'तो कह दीजिएगा कि मुझसे उलझना मौत से उलझना है।' क्रोध में यह कहते हुए विलियम भी अपनी मोटर में जा बैठा। वह वहीं खड़ी पहले उसे और फिर खाली बाग को देखने लगी जहाँ कुछ देर पूर्व लोगों की भीड़ थी।

घर पहुँचकर उसने यह बात विनोद से कह दी। वह डर रही थी कि कहीं सचमुच वह उनपर कोई आपत्ति न ले आए। विनोद उसकी बातों से सहमत न हुआ। उसका विश्वास था कि अपने अधिकारों के लिए लड़ना मानव का कर्तव्य है। सच्चाई के लिए वह बड़ी-से-बड़ी आपत्ति उठाने के लिए तैयार था।

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