लोगों की राय

ई-पुस्तकें >> एक नदी दो पाट

एक नदी दो पाट

गुलशन नन्दा

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :323
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9560

Like this Hindi book 8 पाठकों को प्रिय

429 पाठक हैं

'रमन, यह नया संसार है। नव आशाएँ, नव आकांक्षाएँ, इन साधारण बातों से क्या भय।


उसने दूसरे दिन गम्भीरतापूर्वक योजना बनानी आरम्भ कर दी। दिन-भर वह एक कुर्सी पर बैठा कागज़ पर रेखाएँ खींचता रहा, मानचित्र बनाता रहा। माधवी ने दो-एक बार उससे कुछ पूछा भी, परन्तु उसने यह कहकर टाल दिया-'एक स्वप्न देख रहा हूँ...पूरा हो गया तो बताऊँगा।'

माधवी भी आश्चर्य में थी कि ऐसा कौन-सा स्वप्न है जिसकी धुन में वह सब-कुछ भूल गया है? उसे खाने-पीने की सुध न थी। वह उसके सुन्दर स्वप्नों को भंग करना चाहती थी और बड़े समय

तक मौन बैठी उसे देखती रही। उसने सोचा, चिन्ता के खिंचाव से तो यह मौन अच्छा है-सामने तो रहते हैं!

खेत बह गए, बस्ती के लोग चले गए, उनकी सहानुभूति चली गई, उनका नन्हा-सा निर्माण किया हुआ संसार उजड़ गया; परन्तु उसे इनकी चिन्ता न थी।

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय