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एक नदी दो पाट

गुलशन नन्दा

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :323
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9560

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'रमन, यह नया संसार है। नव आशाएँ, नव आकांक्षाएँ, इन साधारण बातों से क्या भय।


डॉक्टर की सहायता से विनोद की दशा सँभल गई। उसकी नाड़ी चलने लगी। घाव साफ करके उस पर पट्टी बँधवा दी गई। रक्त सँचालन के लिए डॉक्टर ने उसे इंजेक्शन लगा दिया, परन्तु बेहोशी का दौरा समाप्त न हुआ। एक बार साधारण होश आने पर उसने अपने होंठों को हिलाते हुए माधवी को पुकारा, परन्तु फिर बेसुध हो गया। डॉक्टर ने उसे आराम से लेटे रहने का आदेश दिया और थोड़ा-सा होश आने पर भी दवाई की चन्द बूँदें उसके मुँह में उँडे़लने को कह दिया। चोट अत्यधिक थी और उसका प्रभाव मस्तिष्क पर पड़ा था, इसलिए इसका ठीक अनुमान लगाना कठिन था कि वह कब होश में आएगा।

डॉक्टर चला गया। रमन ने विनोद की ओर देखा और सांत्वना की साँस लेते हुए दूसरे कमरे में आ गया। कामिनी अभी तक दीवार से लगी खड़ी थी। उसके मुख पर निराशा को देखकर रमन धीमे स्वर में बोला-'माँ, ऐसे क्यों खड़ी हो?' वह फिर भी चुप रही और फटी-फटी दृष्टि से अपने बेटे को देखने लगी जिसके कपड़ों पर ताज़ा लहू केँ लाल धब्बे झलक रहे थे, मानो किसीने उसके सुहाग का सिन्दूर बिखेर दिया हो। रमन उसकी गम्भीरता को देखकर फिर बोला-'जाओ माँ, आराम करो! डॉक्टर ने कहा है, वह अच्छे हो जाएँगे, चिन्ता की कोई बात नहीं। यह भी कैसा भाग्य, माँ! अथिति बनकर आए थे और चोट खाकर जा रहे हैं।'

कामिनी में और कुछ सुनने का बल न था। उसकी दबी हुई भावनाएँ फूट पड़ी और वह अपने बेटे के गले लगकर रोने लगी। रमन ने उसे सहारा देकर सोफे पर बिठा दिया और अपने सीने से लगाकर ममता के आँसुओं को सुखाने लगा।

रात काफी बीत चुकी थी। विनोद को अभी तक होश न आया था। रमन और कामिनी दोनों साथ वाले कमरे में बैठ उसके होश में आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। दोनों मूर्ति बने एक-दूसरे को देख लेते परन्तु मुँह से कुछ न कहते। आखिर रमन माँ से बोला-'माँ, सो जाओ! रात आधी बीत चुकी है।'

'नींद नहीं आती...तुम्हीं सो जाओ!'

'तुम्हें नींद नहीं आती तो मुझे क्योंकर नींद आएगी, माँ! तुम्हारे तो यह आज ही अतिथि बने हैं, पर मैंने तो इनके साथ कुछ समय व्यतीत किया है।'

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