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एक नदी दो पाट

गुलशन नन्दा

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :323
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9560

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'रमन, यह नया संसार है। नव आशाएँ, नव आकांक्षाएँ, इन साधारण बातों से क्या भय।


रात को खाना खाते समय रमन ने विनोद को बताया कि उत्तरी घाटी में मशीन और औज़ार पहुँचा दिए गए हैं, काम शीघ्र आरम्भ हो जाना चाहिए। इसलिए उसके ठीक हो जाने तक वह अकेला ही वहाँ काम करेगा।

'मुझे तुम पर भरोसा है।' विनोद ने विश्वास से कहा।

'धन्यवाद!'

'हाँ रमन; तुम्हें अकारण ही दुख दिया। तुम्हारी माँ कोसती तो होगी मुझे?

'नहीं, वह तो स्वयं को कोस रही थी कि इतने समय बाद आप हमारे घर आए और...'

'मैं...इतने समय बाद?' वह आश्चर्य से चौंकते हुए बोला।

'जी...इतने समय बाद तो घर में कोई अतिथि आया!'

'ओह!'

'हाँ, मिस्टर मुखर्जी! अभी मैं छोटा ही था कि मेरी माँ पर पर्वत टूट पड़ा और मेरे पिता उसे छोड़ गए।'

'कहाँ चले गए?' माधवी ने आश्चर्य से पूछा।

'स्वर्गलोक।'

'क्या हुआ था उन्हें?'

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