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एक नदी दो पाट

गुलशन नन्दा

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :323
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9560

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'रमन, यह नया संसार है। नव आशाएँ, नव आकांक्षाएँ, इन साधारण बातों से क्या भय।


'और माँ!' रमन अलग होते हुए बोला।

'क्या? यह क्या है?'

'साड़ी।'

'किसके लिए?' कामिनी ने उँगलियों से साड़ी को स्पर्श करते हुए पूछा।

'माधवी आण्टी के लिए।'

'रमन!' वह सहसा गम्भीर होकर अपने बेटे को आश्चर्य से देखते हुए बोली।

'हाँ माँ, यह गर्म कोट का कपड़ा मिस्टर मुखर्जी के लिए।'

कामिनी चुप रही, परन्तु उसके मौन ने रमन को बता दिया कि उसकी ये बातें उसकी माँ को अच्छी नहीं लगीं।

'क्यों माँ, तुम्हें अच्छा नहीं लगा?'

'क्या?'

'उन दोनों के लिए ये उपहार...'

'रमन!'

'हाँ, माँ!'

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