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एक नदी दो पाट

गुलशन नन्दा

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :323
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9560

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'रमन, यह नया संसार है। नव आशाएँ, नव आकांक्षाएँ, इन साधारण बातों से क्या भय।


'कितनी कठोरता है! तुमसे धोखा, माधवी से धोखा, मुझसे धोखा, स्वयं से धोखा...पूरी दुनिया से धोखा...आखिर क्यों माँ? क्या इन्सान इतना कठोर-हृदय भी होता है?'

'कुछ लोग कठोर हृदय भी होते हैं, और कुछ बना दिए जाते हैं। माधवी में कामिनी की पूरी बात सुनने की सहन-शक्ति न हुई और वह बड़ी कठिनाई से अपने-आपको संभालते हुए पीछे से ही बाहर निकल गई। रमन के ये शब्द लगातार उसके कानों में गूँज रहे थे-'तुमसे धोखा, माधवी से धोखा, मुझसे धोखा, पूरी दुनिया से धोखा?

उसके मस्तिष्क की नसें खिंचकर टूट जाना चाहती थीं। विचित्र विचारों से उसका सिर घूमने लगा। डगमगाते हुए बोझिल मन से वह चुपचाप गाड़ी में आ बैठी। किस चाव से वह रमन को छोड़ने आई थी और कितनी बडी चिन्ता का बोझ लेकर लौट रही थी! एक ही क्षण में उसकी प्रसन्नता, आकांक्षाएँ, ढेर हो गईं। लू के एक ही झोंके ने वसन्त की अछूती कलियों को भस्म कर डाला।

उसके हाथ-पांव ठण्डे थे। उसने एक-दो बार गाड़ी स्टार्ट करने का प्रयत्न भी किया, परन्तु बल ने उसका साथ न दिया और वह शिथिल-सी स्टीयरिंग पर सिर टिकाकर बैठ गई। उसकी आँखों के सामने विनोद की आकृति आने लगी। कामिनी सच ही तो कहती है! मृत्यु की आड़ में वह दूसरा ब्याह करके आनन्द उड़ा रहा है। उसे यों अनुभव हुआ मानो इस भेद के खुलते ही उसके हृदय में अगणित नश्तर लग रहे हों जिसकी चुभन से वह तड़प रही हो।

बीते हुए दिन उसके मस्तिष्क के छाया-पटल पर आने लगे-विनोद से भेंट...हवाई जहाज़ की दुर्घटना...उनका मेलजोल और घनिष्ठता...पटना का प्रेम-अलाप...लाहौर से विनोद की वापसी ...उसे इन सबमें एक धोखा दिखाई देने लगा।

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