लोगों की राय

ई-पुस्तकें >> एक नदी दो पाट

एक नदी दो पाट

गुलशन नन्दा

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :323
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9560

Like this Hindi book 8 पाठकों को प्रिय

429 पाठक हैं

'रमन, यह नया संसार है। नव आशाएँ, नव आकांक्षाएँ, इन साधारण बातों से क्या भय।


'स्वर्गलोक!'

'ओह...तो इसमें उसका क्या दोष? मृत्यु पर किसका बस?'

'यही तो समस्या है! मृत्यु ले जाती तो बेचारी छाती पर पत्थर रखकर धैर्य कर लेती?'

'तो?'

'वह इसी दुनिया में है और मौत की आड़ में दूसरा ब्याह करके सूख और आनन्द से जीवन व्यतीत कर रहा है।'

'उसने यह क्योंकर जाना?'

'बरसों से स्वयं को विधवा समझे, रमन के जीवन की थपेड़ों से रक्षा करती हुई वह अपनी मंज़िल की ओर बढ़ती चली जा रही थी कि...कि उसने अचानक उस व्यक्ति को देख लिया जिसके नाम पर वह विधवा का जीवन व्यतीत कर रही है। अपना नाम और वेशभूषा बदलकर वह व्यक्ति दूसरा जीवन बिता रहा है।'

'ओह! मुझे विश्वास नहीं आता।'

'आपको इसका विश्वास क्यों आएगा? आप ठहरे पुरुष और वह भी कोमल-हृदय! आपकी बुद्धि में ऐसा कठोर व्यवहार कैसे आ सकता है!'

'हाँ, यही तो सोच रहा हूँ कि ऐसा हृदय किसका होगा? यह सब तुमसे कामिनी ने कहा है?'

'जी, यह सच है। आप ही कहिए; इतनी दुख-भरी कहानी सुनकर कौन है जो दुःखी न हो?'

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय