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एक नदी दो पाट

गुलशन नन्दा

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :323
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9560

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'रमन, यह नया संसार है। नव आशाएँ, नव आकांक्षाएँ, इन साधारण बातों से क्या भय।


'नहीं साहब, यह न होगा।'

'यह इनाम है तुम्हारा...इसे इन्कार नहीं करते।'

'यह मेरी ड्यूटी थी, सर!'

'रख भी लो! देखो, ठण्ड से शरीर अकड़ रहे हैं।' विनोद ने वह नोट बलपूर्वक उसके हाथ में देते हुए सामान उठाया और माधवी को साथ लेकर होटल की ओर बढ़ा।

ऊपरी मंजिल में कोने वाला कमरा उन्हें मिला। जैसे ही माधवी ने खिड़की के किवाड़ खोले, सरसराती ठण्डी हवा के झोंके यों भीतर आए मानो किसी नदी की बौछार बाँध तोड़कर आ गई हो और पूरे वातावरण को भिगो गई हो।

विनोद सामान रखकर जब उसके पास आया तो वह ठण्ड से ठिठुर रही थी। विनोद ने बैरे को कॉफी लेने का आर्डर दिया और उसे गर्म पानी से मुँह धोने को कहा। कॉफी पीने से ठण्ड कुछ कम हुई और दोनों बैठकर बातें करने लगे।

बहुत रात गए तक दोनों बातें करते रहे। दोनों अपने बीते हुए जीवन को कुरेदकर चुनी हुई घटनाओं को दोहराते रहे। विनोद अपने जीवन की अन्धकारमय रातों को पर्दे में ही रखा।

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