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फ्लर्ट

प्रतिमा खनका

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :609
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9562

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जिसका सच्चा प्यार भी शक के दायरे में रहता है। फ्लर्ट जिसकी किसी खूबी के चलते लोग उससे रिश्ते तो बना लेते हैं, लेकिन निभा नहीं पाते।

43

एक जगमगाती रात।

विले पार्ले के एक 5 स्टार होटेल का शानदार लान।


रंगीन रोशनियों से रंगी पानी की कई धारायें ऊपर जाकर एक हो रही थीं। कुछ बेरंग बूँदें टूटकर झिलमिलाती हुई जमीन पर बिखर जातीं और कुछ आपस में ही टकराये कोहरे में बदल जातीं। लान का ये ही अन्धेरा सा कोना और उससे कुछ दूर फूटता पानी का फव्वारा। इस पूरी पार्टी में मेरे लिए बस ये ही दो चीजें थीं।

काफी वक्त बाद में किसी पार्टी में दिखायी दिया और ये उससे कहीं ज्यादा बोरिंग थी जितना मैंने तैयार होते वक्त सोचा था लेकिन अगर यहाँ ना आता तो आज वाकई संजय नाराज हो जाता मुझसे। उसके लिए ये पार्टी और पार्टी देने वाला दोनों ही महत्वपूर्ण थे। मुझे यहाँ होना ही होना था।

एक हाथ पैन्ट की जेब में और दूसरे हाथ से बची हुई ड्रिंक को गिलास के अन्दर ही अन्दर घुमाते हुए मैं उन लोगों पर मुस्कुरा रहा था जो इस पार्टी को बेहद इन्जॉय कर रहे थे। संजय इसी पार्टी के किसी दूसरे कोने में किसी नये चेहरे के साथ मशरूफ था और मैं अपनी जान पहचान के लोगों से बचते-छुपते। मैं अपने इस एकान्त कोने से बहुत सन्तुष्ट था। मैं बस वक्त काट रहा था वेबजह यहाँ वहाँ टहलते हुए कि अचानक वहाँ संजय आ धमका और मेरा हाथ पकड़कर मुझे एक तरफ खींचने लगा।

‘संजय, कहाँ ले जा रहे हो?’ मैंने अपना हाथ पीछे खींचते हुए पूछा।

‘मेरे बाप फाँसी लगाने नहीं ले जा रहा। कोई तुझसे मिलने के लिए मरा जा रहा है!’ वो नशे में था।

‘अब कौन बचा है? हम तो यहाँ से निकलने वाले थे न?’ मैं मन मारकर उसके साथ चल पड़ा।

‘हाँ चलेंगे ना। वैसे, तूने कभी बताया नहीं कि सोनाली से तेरी बातचीत है।’

‘तुमने ही तो उसे मेरा नम्बर दिया था। भूल गये?’

उसकी खींचतान एक पल को रुक गयी और उसके कदम भी।

‘ओह! तभी मैं सोच रहा था कि तू बिना मेरी सलाह के इतनी अक्ल का काम कैसे कर सकता है?’

‘मतलब?’

‘कुछ नहीं! लेकिन ये एक ऐसी लड़की है जिसके करीब रहना वाकई अक्लमन्दी होगी।’

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